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बैंगन की वैज्ञानिक खेती - Kisan Suvidha
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बैंगन की वैज्ञानिक खेती

बैंगन की वैज्ञानिक खेती

बैंगन एक महत्वपूर्ण सब्जी की फसल है । जिसका प्रयोग सब्जी, भुर्ता, कलौंजी तथा अन्य व्यंजन बनाने के लिए किया जाता है । दक्षिण भारत में तो छोटे बैंगन की प्रजाति का प्रयोग सांभर बनाने में किया जाता है । स्थानीय मांग के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों व प्रान्तों में अलग-अलग किस्में प्रयोग में लाई जाती हैं । अधिक उपज व आमदनी के लिए उन्नतशील किस्मों एवं वैज्ञानिक तरीकों से खेती करना आवश्यक है ।

 

भूमि का चुनाव और उसकी तैयारी

भूमि की अच्छी उपज के लिए गहरी दोमट भूमि, जिसमें जीवांश की पर्याप्त मात्रा हो, सिंचाई और जल निकास के उचित प्रबंधन हो सबसे अच्छी समझी जाती है । बलुई दोमट भूमि में फलत तो शीघ्र मिलती है, लेकिन वानस्पतिक वृद्धि कम होती है, जिसके फल स्वरूप पैदावार कम मिलती है । साथ ही चिकनी भूमि में फलत देर से मिलती है, परन्तु वानस्पति वृद्धि अधिक हो जाती है व पैदावार मध्यम होती है । इसलिए दोमट भूमि का चुनाव अति आवश्यक है । भूमि की तैयारी के लिए पहली जुताई डिस्क हैरो से तथा 3-4 जुताईयाँ कल्टीवेटर से करके पाटा लगा देते हैं । खेत की तैयारी के समय पुरानी फसल के अवशेषों को इकट्ठा करे जला दें । जिससे कीटों एवं बीमारियों का प्रकोप कम हो ।

 

बैंगन की उन्नत किस्में

1.पंजाब सदाबहार

इस किस्म के पौधे सीधे खड़े, 50-60 से.मी. ऊँचाई के, हरी शाखाओं और पत्तियांे वाले होते हैं । फल चमकदार, गहरे बैंगनी रंग के होते हैं जो देखने में काले रंग के प्रतीत होते हैं । फलों की लम्बाई 18 से 22 से.मी. तथा चैड़ाई 3.5 से 4.0 से.मी. होती है । समय से तुड़ाई करते रहने पर रोग व फल छेदक कीट का प्रकोप कम होता है । औसतन एक हैक्टेयर खेत से 300-400 कुंटल पैदावार प्राप्त होती है ।

2.काशी तरू

फल लम्बे, चमकीले गहरे बैंगनी रंग के होते हैं रोपाई के 75-80 दिन उपरान्त तुड़ाई के लिए उपलब्ध होते हैं और उपज 700-750 कु./है. होती है ।

3.काशी प्रकाश

फल लम्बे पतले और चमकीले हल्के बैंगनी रंग के होते है । जिनका औसत वनज 190 ग्राम होता है । रोपाई के 80-85 दिन उपरान्त तुड़ाई के लिए उपलब्ध होते हैं और 600-650 कु./है. उपज प्राप्त की जा सकती है ।

4.पूसा परपल लाँग

इसकेे पौधे 40-50 से.मी. ऊँचाई के, पत्तियाँ व तने हरे रंग के होते हैं । पत्तियो के मध्य शिरा विन्यास पर काँटे पाये जाते हैं । पत्तियों के मध्य शिरा विन्यास पर काँटे पाये जाते हैं । रोपण के लगभग 75 दिन बाद फलत मिलने लगती है । फल 20-25 से.मी. लम्बे, बैंगनी रंग के, चमकदार व मुलायम होते हैं । फलों का औसत वजन 100-150 ग्राम होता है । इसकी पैदावार 250-300 कु./है. है ।

5.पंत सम्राट

पौधे 80-120 से.मी. ऊँचाई के, फल लम्बे, मध्यम आकार के गहरे बैंगनी रंग के होते है । यह किस्म फोमोप्सिस झुलसा व जीवाणु म्लानि के प्रति सहिष्णु है । रोपण के लगभग 70 दिनों बाद फल तुड़ाई योग्य हो जाते है । इनके फलों पर तना छेदक कीट का असर कम पड़ता है । वर्षा ऋतु में बुआई के लिए यह किस्म उपयुक्त है । प्रति हैक्टेयर औसतन 300 कुंटल पैदावार होती है ।

6.काशी संदेश

पौधों की लंबाई 71 से.मी., पत्तियों में हल्का बैंगनी रंग लिए होते हैं । फल गहरे बैंगनी रंग के गोलाकर और चमकीले होते हैं । फल का औसत वजन 225 ग्राम होता है और रोपाई के 75 दिन बाद तुड़ाई कर 780-800 कु./है. की उपज प्राप्त की जा सकती है ।

7.पंत ऋतुराज

इस किस्म के पौधे 60-70 से.मी. ऊँचे, तना सीधा खड़ा, थोड़ा झुकाव लिए हुए, फल मुलायम, आकर्षक, कम बीज वाले, गोलाकार तथा अच्छे स्वाद वाले होते हैं । यह किस्म रोपण के 60 दिन बाद तुड़ाई योग्य तैयार हो जाती है । यह किस्म जीवाणु उकठा रोग के प्रति सहिष्णु है तथा दोनों ऋतुओं (वर्षा व ग्रीष्म) में खेती योग्य किस्म है । इसकी औसत पैदावार 400 कु./है. है ।

8.रामनगर जाइण्ट

वाराणसी और आस-पास के क्षेत्रों में प्रचलित इस किस्म के पौधे मजबूत, हल्के हरे रंग के शाखाओं व पत्तियों वाले होते हैं । फल हरे-सफेद रंग के औसतन 15-20 से.मी. लम्बे व 15-20 से.मी. व्यास के औसतन 1 कि.ग्रा. वजन के होते हैं । बैंगन का भर्ता बनाने के लिए यह किस्म बहुत उपयुक्त है । इसकी औसत उपज 400 कु./है होती है ।

 

खाद एवं उर्वरक

बैंगन में खाद एवं उर्वरक की मात्रा इसकी किस्म, स्थानीय जलवायु व मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करती है । अच्छी फसल के लिए 8-10 टन सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयार करते समय-समय तथा तत्व के रूप में 80 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 50 कि.ग्रा. फास्फोरस व 50 कि.ग्रा. पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से प्रयोग करें । नाइट्रोजन की एक तिहाई व फास्फोरस व पोटाश की सम्पूर्ण मात्रा खेत की अंतिम जुताई के समय तथा नत्रजन को दो बराबर भागों में बाँट कर 30 व 45 दिन बाद, खरपतवार नियंत्रण के पश्चात् खड़ी फसल में छिटक कर दें ।

 

बीज की मात्रा

इसके अंकुरण प्रतिशत पर निर्भर करती है । एक हैक्टेयर में फसल रोपण के लिए 250 से 300 ग्राम बीज की आवश्यकता होती है । बीज पौधशाला में बुआई कर पौध तैयार की जाती है ।

 

बीज बुआई व रोपण

उत्तर भारत में बैंगन लगाने का मुख्य समय जून-जुलाई का महीना है । पौध 20 जून के आस-पास पौधशाला में डालना प्रारंभ कर देते हैं और रोपण जुलाई माह में करते हैं । अच्छी प्रकार से तैयार खेत में सिंचाई के साधन के अनुसार क्यारियाँ बना लें । क्यारियों में लम्बे फल वाली प्रजातियों के लिए 70-75 से.मी. और गोल फल वाली किस्मों के लिए 90 से.मी. की दूरी पर पौध रोपण करें । रोपण के समय यह ध्यान रखें कि पौधे कीट तथा रोग रहित हो । वर्षा के अनुसार रोपण मेड़ों या समतल क्यारियों में करें । रोपण जहाँ तक हो सके सांयकाल के समय ही करें ।

 

सिंचाई

रोपण के पश्चात् फुहारे की सहायता से पौधों के थालों में 2-3 दिनों तक, सुबह और सांयकाल हल्का पानी दें, इसके बाद हल्की सिंचाई करें ताकि पौधे जमीन में अच्छी तरह पकड़ लें । बाद में आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें । साधारणतया गर्मी के मौसम में 10-15 दिन और सर्दी के मौसम में 15-20 दिन के अंतराल पर सिंचाई करें । यदि पौध मेड़ों पर लगाई गई है तो सिंचाई आधी मेड़ तक करें और सिंचाई अंतराल कम रखें । वर्षा ऋतु में यदि वर्षा अधिक हो रही हो तो खेत से वर्षा का पानी निकालने के लिए निकास नाली की सतुचित व्यवस्था होनी चाहिए ।

 

अंतः सस्य क्रियायें

बैैंगन का पौधा काफी वृद्धि करता है । अतः फल लगने के बाद वह जमीन पर न गिर जाए या टूट न जाए इससे बचाव के लिए रोपण के 25-30 दिन बाद खेत की गुड़ाई करके जड़ों के पास मिट्टी चढ़ाना अत्यन्त आवश्यक होता है । साथ ही साथ मिट्टी चढ़ाने से पानी देने के पश्चात् ऊपर की मिट्टी सख्त नहीं हो पाती और वायु संचार बना रहता है । गुड़ाई करते समय यह ध्यान रहे कि पौधों की जड़ों को नुकसान न पहुंचे अन्यथा पौधे सूख जाएंगे । रोपण के 40-50 दिन तक बैंगन की फसल को खरपतवार से मुक्त रखना चाहिए । क्योंकि यह पौधों को विकसित होने का उपयुक्त समय होता है । खरपतवार उगे होने से पौधे का विकास अच्छा नहीं हो पाता है क्योंकि उनकी खुराक खरपतवार ले लेते हैं ।

 

फलों की तुड़ाई

फलों की तुड़ाई एक निश्चित अंतराल पर करते रहना चाहिए अन्यथा फल कड़े हो जाते हैं और बाजार भाव घट जाता है । यह ध्यान रखें कि जब फलों की पूरी बढ़वार हो जाये और उनका रंग चमकदार हो और उनमें बीज मुलायम हो तभी तुड़ाई कर लेनी चाहिए ।

 

उपज

बैंगन की पैदावार उसकी किस्म, मिट्टी के प्रकार एवं मौसम के ऊपर निर्भर करती है । औसतन एक हैक्टेयर खेत में लगभग 400-600 कुंटल उपज प्राप्त हो जाती है ।

 

बैंगन के कीट एवं नियंत्रण

1.बैंगन का तना एवं फल वेधक कीट

बैंगन का यह प्रमुख एवं घातक कीट पूरे भारत में पाया जाता है । इसके द्वारा 50-93 प्रतिशत से ज्यादा क्षति हो जाती है । इस कीट का प्रकोप आमतौर पर पौध रोपाई के एक सप्ताह बाद शुरू हो जाता है । सूड़ी अवस्था में ही यह कीट फसल को नुकसान पहंुचाता है । सूड़ी पौधों के प्ररोहों में छेदकर खाती हैं जिसके फलस्वरूप प्ररोह (शीर्ष) मुरझाकर लटक जाते हैं । पौधों में जब फल लगता है तो ये फल कुट (कैलिक्स) के ऊपर सुराख बनाकर फल के अन्दर जाकर खाते हैं और सुराख को अपने मल से बंद कर देती हैं । एक सूड़ी 4-6 फलों को नुकसान पहुंचाती है । सूंड़ी जब पूर्ण विकसित हो जाती है तो फल में सुराख बनाकर बाहर निकल आती हैं और फिर जमीन के अंदर प्यूपा बनाती है ।

नियंत्रण

तना एवं फल वेधक कीट द्वारा ग्रसित तनों को ऊपर से सूड़ी सहित तोड़कर नष्ट कर देना चाहिए । यह क्रिया हफ्ते में एक बार करना चाहिए । दस मीटर के अंतराल पर प्रति हैक्टेयर में 100 फेरोमोन फंदा लगाकर नर कीटों को सामूहिक रूप से आकर्षित करने से खेत में अण्डों की संख्या में काफी कमी हो जाती है । नीम गिरी 4 प्रतिशत (40 ग्राम नीम गिरी का चूर्ण एक लीटर पानी में) घोल बनाकर दस दिन के अंतराल पर फसल में छिड़काव लाभकारी सिद्ध हुआ है । आवश्यकतानुसार रैनेक्सपायर 18.5 एस.सी. / 0.2-0.4 मि.ली./ली. या इम्मामेक्टिन बेंजोएट 5 एस.सी. / 0.35 ग्राम/ली. या फेनाप्रोपेथ्रिन 30 ई.सी. / 0.5 मि.ली./ली. या लैम्डा साइहैलोथ्रिन 5 ई.सी. / 0.65 मि.ली./ली. को वानस्पतिक अवस्था या पुष्पावस्था के दौरान 10-15 दिन के अंतराल पर बदल-बदल कर छिड़काव करने से इस कीट के संक्रमण में कमी आती है ।

 

2.हरा फुदका (जैसिड)

जैसिड बैंगन के प्रारंभिक अवस्था में पत्तियों का रस चूसकर बहुत नुकसान पहुंचाता है । वयस्क हरा फुदका 2 मिमी लम्बा हरे रंग का तथा पच्चर के आकार का होता है । जबकि तरूण (निम्फ) हरे श्वेत रंग का होता है । इसके अगले दोनों पंखों पर दो काले धब्बे पाए जाते हैं । तरूण और वयस्क दोनों ही हानिकारक होते हैं, तथा तिरछी चाल चलते हैं । तरूण और वयस्क दोनों ही बैंगन की पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं । साथ-साथ अपना जहरीला लार उसमें छोड़ते हैं । इनसे प्रभावित भाग पीला हो जाता है तथा पत्ती किनारे से अंदर की ओर मुड़ने लगती है जिससे प्याले के आकार की हो जाती है । धीरे-धीरे पूरी पत्ती पीले धब्बों से भर जाती है तथा सूख कर गिरने लगती है । इसके प्रकोप से पैदावार काफी घट जाती है ।

नियंत्रण

रोपाई से पहले बैंगन की पौध की जड़, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल. दवा के घोल (1 मि.ली. रसायन प्रति लीटर पानी में घोलकर) में एक घण्टे तक डुबोकर रोपाई करने से फसल को इस कीट से 30 दिन तक प्रभावित होने से बचाया जा सकता है । नीम गिरी 4 प्रतिशत का प्रयोग 10 दिन के अंतराल पर भी लाभकारी देखा गया है । इमिडाक्लोप्रिड 17.8 / 0.35 मि.ली./लीटर या थायोमेथोक्जाम 25 डब्ल्यूजी / 0.35 मि.ली./लीटर को रोपण के 25 दिन बाद 10 – 15 दिन के अंतराल पर छिड़कने से इस कीट के प्रकोप से फसल को बचाया जा सकता है ।

 

3.लाल स्पाइडर माइट

प्रायः गर्मी वाली बैंगन की फसल में इस माइट द्वारा फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है । इनके शिशु तथा प्रौढ़ पत्तियों के निचली सतह पर रस चूसते हैं और वहीं अपने द्वारा बनाये गये सिल्कनुमा जाल से ढंके रहते हैं । इनके रस चूसने से पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीली चित्तियां उभर आती हैं और धीरे-धीरे प्रभावित पत्तियां मुरझा कर सूख जाती हैं ।

नियंत्रण

माइट द्वारा ग्रसित पत्तियों को हटाना एवं नष्ट कर देना चाहिए । कोई भी मकड़ीनाशक जैसे स्पाइरोमेसीफेन 22.9 एससी. / 0.8 मिली/लीटर या डाइकोफाल 18.5 ईसी. / 5 मिली/लीटर या फेनप्रोथ्रिन 30 ईसी. / 0.75 या फ्लूमाइट/फ्लूफेंजिन 20 एससी./1 मिली/लीटर की दर से 10-15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें ।

 

बैंगन के रोग एवं नियंत्रण

1.फोमोप्सिस झुलसा एवं फामोप्सिस फल सड़न

यह बैंगन की प्रमुख बीमारी है, जिसका प्रभाव पौधे के प्रत्येक भाग पर होता है । पौधों की पत्तियों के निचली सतह पर गोलाकर, हल्के भूरे धब्बे दिखाई पड़ते हैं । धब्बे के बीच का हिस्सा हल्के रंग का होता है । पुराने धब्बे के ऊपर बहुत छोटे-छोटे काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं । निचले तने की गाँठों के पास भूरी धँसी हुई सूखी सड़नें देखने को मिलती है । कुछ टहनियाँ सूख जाती हैं । पुराने फलों के ऊपर हल्के भूरे धँसे हुए धब्बे बनते हैं, प्रभावित फल सड़ने लगता है और धीरे-धीरे सम्पूर्ण फसल नष्ट हो जाती है ।

नियंत्रण

रोग रहित बीज की बुआई करें, बीजों को कार्बेन्डाजिम से 2.5 ग्राम दवा प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करके बुआई करें । रोगरोधी किस्मों का चयन करें तथा फसल चक्र अपनायें । सवंमित फसल अवशेष को इकट्ठा करके जला दें । बीज की फसल में पहली तुड़ाई करने के बाद ही फलों को बीज के लिए छोडें । बीज वाली फसल में एक बार कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत या 0.15 प्रतिशत कार्बेन्डाजिम $ मैंकोजेब (1.5 ग्रा./ली. पानी के साथ) घोल बनाकर छिड़काव अवश्य करें ।

 

2.जीवाणु उकठा रोग

इसका प्रकोप पहले पूरे पौधे पर एक साथ मुरझान के रूप में दिखाई पड़ता है । तने को काटकर देखने पर भूरे रंग का जमा हुआ पदार्थ दिखाई देता है । इसमें से सफेद लसलसेदार छोटी-छोटी बूंद उस पर आ जाती है ।

नियंत्रण

रोगरोधी किस्मों का चयन इस रोग का सबसे कारगर उपाय है । लम्बी अवधि का फसल चक्र अपनायें जिसमें सोलेनेसी कुल (टमाटर, बैंगन, मिर्च) की फसल न हो । खेत का पी.एच. अम्लीय नहीं होना चाहिए । पौधों की जड़ों को रोपण से पूर्व स्ट्रेप्टोसाइक्लिन नामक दवा के 150 पी.पी.एम. (1 ग्राम दवा 6 लीटर पानी में) के घोल में 30 मिनट तक डुबोने के पश्चात् रोपण करें ।

 

 

स्रोत-

  • भा.कृ.अनु.प.-भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान पो.आ.-जक्खिनी (शाहंशाहपुर), वाराणसी-221 305, उत्तर प्रदेश

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