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नींबू वर्गीय फलों के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण - Kisan Suvidha
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नींबू वर्गीय फलों के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

नींबू वर्गीय फलों के रोग

नींबू वर्गीय फलों के प्रमुख रोग एवं नियंत्रण

भारत में नींबू वर्गीय फलों की उत्पापकता लगभग 12 – 30 टन प्रति हेक्टर है, जो कि विश्व के कई देशों की उत्पादकता से कम है नींबू वर्गीय फलों के कम उत्पादकता का कारण अनेक जैविक और अजैविक बाधाएं हैं । जैविक बाधाओं में फफूंद, जीवाणु, विषाणु, वायराॅड्स और फाइटोप्लाज्मा आदि महत्वपूर्ण हैं । इन रोगों से नींबू वर्गीय फसलों के उत्पादकता में काफी कमी आ जाती है । पोषक तत्वों की कमी, वातावरण का प्रभाव, सस्य क्रियाओं के अभाव के कारण नींबू वर्गीय पौधों में तमाम व्याधियाँ होती हैं जिनका विवरण निम्नानुसार है:-

1.सिट्रस ट्रिस्टेजा

इस रोग का फैलाव सभी नींबू वर्गीय फल वृक्षों के उत्पादक क्षेत्रों में होता है । यह नींबू वर्गीय फलों का वायरस जनित सबसे भयंकर रोग है यह रोग सिट्रस ट्रिस्टेजा विषाणु से होता है ।

नियंत्रण

कलम बांधने के लिए रोग रहित कलिका और कलम का उपयोग करना चाहिए । कीटनाशी दवा क्लोरोपायरीफाॅस 20 ई.सी. 2 मि.ली. या डायमेथोऐट 30 ई.सी. 1 मि.ली. दवा प्रति लीटर के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव जरूरत के अनुसार करना चाहिए । इससे रोग वाहक चेंपा ( ऐफिड ) कीट की रोकथाम हो जाती है ।

 

2.हरितिमा रोग

इससे प्रभावित पौधों की पत्तियां छोटी, ऊपर की तरफ दिखती हैं । पत्तियों की नसें हरी रहती हैं शेष भाग पीला पड़ जाता है । जिंक की कमी से मिलते हुए लक्षण जैसे प्रतीत होते हैं । पौधों की इंटर नोट की लम्बाई कम हो जाने के कारण पौधा बहुत छोटा हो जाता है । फल छोटे विकृत आकार के तथा स्वाद में अच्छे नहीं होते हैं ।

नियंत्रण

नये बगीचे लगाते समय रोग मुक्त नर्सरी से ही पौधे खरीदें और इसका रोपण करें । इसके नियंत्रण हेतु ट्राइफोलियेट आरेंज ( पोंसीरस ट्राइफोलियेट ) मूलवृंत का उपयोग करना चाहिए । जो ग्रींनिग रोग के लिए प्रतिरोधक है । कीटनाशी दवा क्लोरोपायरीफाॅस 20 ई.सी., 2 मि.ली. या डायमेथोऐट 30 ई.सी. 1 मि.ली. दवा प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव जरूरत के अनुसार करना चाहिए इससे रोग बाहर घेंघा ( एफिड ) कीट की रोकथाम हो जाती है|20 दिन के अन्तर पर 2 – 3 छिड़काव करें । स्ट्रप्टोसाइक्लिन 500 पी.पी.एम. के साथ 0.25 प्रतिशत काॅपर आॅक्सीक्लोराइड के मिश्रण को वर्षा के समय 3 छिड़काव करने चाहिए ।

 

3.सिट्रस डिक्लाइन

इस रोग के प्रमुख लक्षण पौधे की बढ़वार रुकना, पत्तियों में क्लोरोफिल का हृास, कम शाखाओं का निकलना, तने के ऊपरी हिस्से से टहनियों का सूखना शुरू हो जाना प्रभावित डालियों का सूखना प्रारम्भ होने की स्थिति में फूल काफी संख्या में आते हैं । परन्तु फल कम लगते हैं । जो लगते भी हैं तो वे आकार में बहुत छोटे होते हैं फलों का छिलका मोटा हो जाता है ।

नियंत्रण

इस समस्या के तमाम कारणों में मृदा का पी.एच. मान 7-7.5 के मध्य होना अच्छे व स्वस्थ तथा रोग रहित पौधों का ही रोपण किया जाए । पौधों को प्रतिवर्ष आयु के अनुसार 100 ग्राम डी.ए.पी., 125 ग्राम यूरिया तथा 25 ग्राम म्यूरेट आॅफ पोटाश दिया जाए । 10 वर्ष तक उर्वरक की इस मात्रा को बढ़ाते हैं । इसके बाद स्थिर कर देते हैं । लैश तत्वों की कमी दूर करने के लिए सितम्बर में एग्रेमिन 3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें ।

 

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय जबलपुर,मध्यप्रदेश

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