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तरबूज और खरबूज की खेती ( Watermelon and Muskmelon cultivation )- मध्यप्रदेश - Kisan Suvidha
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तरबूज और खरबूज की खेती ( Watermelon and Muskmelon cultivation )- मध्यप्रदेश

तरबूज एवं खरबूज की खेती

तरबूज और खरबूज की खेती ( Watermelon and Muskmelon cultivation )- मध्यप्रदेश

परिचय(Introduction)

तरबूज एवं खरबूज ग्रीष्मकालीन माहत्वपूर्ण फसल हैं। इनके कच्चे फलों का उपयोग सब्जी के रूप में किया जाता हैं। पके हुए फल मीठे, शीतल तथा दस्तावर होते हैं एवं प्यास शांत करते हैं।

 

भूमि का चुनाव(Land selection)

तरबूज एवं खरबूज के लिये उचित जल निकास वाली बलुई दोमट मृदा सर्वोत्तम हैं। मृदा का पी.एच.मान 6 से 7 तक होना चाहिये। अधिकतर नदियों के कछार में इन फसलों की खेती की जाती हैं।

 

भूमि तैयारी(Land preparation)

सामान्यतः तरबूज एवं खरबूज को गढढों में लगाया जाता हैं। गढढे बनाने से पूर्व खेत में दो बार हल एवं दो बार बखर या डिस्क हैंरों चलाकर भूमि को अच्छी तरह भुरभुरी बना लें।

 

उन्नत जातियाँ(Varieties of Watermelon and Muskmelon)

अधिक पैदावार लेने के लिये उन्नत जातियों को ही उगायें।

 

क-तरबूज की किस्में (Varieties of Watermelon)

  1. शुगर बेबी – इसके फल का वनज 2-3 किलो होता है यह मीठे तथा बीज छोटे व कत्थई रंग के होते हैं।
  2. अर्का ज्योति – फल गोल, गहरी हरी धारी युक्त, मीठे व 4-6 किलो वनज के होते हैं।
  3. दुर्गापुर मीठा – फल 6-8 किलो वजनी, मीठा सफेद, हरा धारी युक्त होता हैं। इसका गूदा रवेदार स्वादिष्ट होता हैं।
  4. अर्का मानिक – यह किस्म एन्थ्रेक्नोज, बुकनी रोग तथा पौध गलन के प्रति रोग निरोधक हैं।
  5. पूसा बेदाना – यह बीज रहित किस्म हैं। फल कुछ तिकोने आकार एवं गूदा लाल रंग का होता है एवं फल काफी मीठा होता हैं। प्रति फल का वनज 5-6 किलो होता हैं यह किस्म 115-120 दिनों में पककर तैयार होती हैं।
  6. अन्य किस्में असाही यमातो, दुर्गापुर केसर आदि।

 

ख-खरबूज की किस्में (Varieties of Muskmelon)

  1. पूसा राराज – इसकी बेलें घनी होती हैं फल लंबे एवं छिल्का धारीदार होता हैं एवं फसल उपज 250 क्विं./हे. होती हैं।
  2. पंजाब रसीला – फल गोल एवं गूदा पीले हल्के रंग का होता है एवं छिल्का जालीदार होता है इसकी उपज लगभग 160 क्विं/हे. होती हैं।
  3. लखनऊ सफेदा – यह जल्दी पकने वाली किस्म हैं। फल गोल, छोटे चपटे एवं तकरीबन 300 ग्राम तक होते हैं एवं इसे काफी दिनों तक सुरक्षित अवस्था में रखा जा सकता हैं।
  4. पूसा शरबती – यह शीघ्र पकने वाली किस्म हैं। फल गोल आकार के होते हैं फलों की मिठास मध्यम होती हैं।
  5. पूसा मधुरस – फल गहरे हरे धारीदार एवं पीले हरे, छिल्का युक्त होता हैं।
  6. हरा मधु – फल बड़े, मीठे, हरी धारीदार तथा पीले रंग के होते हैं।
  7. दुर्गापुर मधु – इसका फल बहुत मीठा एवं रंग पीला हरा रंग होता हैं।
  8. अन्य किस्में – अर्काजीत, स्वर्णा, अर्का राजहंस, पंजाब सुनहरी आदि।

 

फसल चक्र (Crop rotation)

  1. भिण्डी – मटर – तरबूज
  2. बरबटी – आलू – तरबूज/खरबूज
  3. मिर्च – तरबूज
  4. भिण्डी – आलू – खरबूज
  5. सोयाबीन – हरी प्याज़ – तरबूज

 

बीजोपचार( Seed treatment)

बीजों को बोने से पहले थायरम 3 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से उपचारित करें। बीज को 24-36 घंटे तक पानी में भिगो कर रखने के बाद बुआई करें अच्छा अंकुरण होगा एवं फसल 7-10 दिन पहले आयेगी।

 

बोने का समय(Sowing time for Watermelon and Muskmelon)

तरबूज़ एवं खरबूज को दिसम्बर से मार्च तक बोयें किन्तु मध्य फरवरी का समय सर्वोत्तम होता हैं। उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान में वर्षा ऋतु में भी मटीरा किस्म की फसल ली जाती हैं।

 

बीज दर

तरबूज के लिये 5-6 किलोग्राम तथा खरबूज के लिये 4-6 किलोग्राम बीज की मात्रा एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिये आवश्यक होती हैं।

 

बोने की विधि(Sowing method)

तरबूज एवं खरबूज को लगाने की निम्नलिखित विधियाँ हैं –
  1. उथला गढ्ढा विधि – इस विधि में 60 से.मी. व्यास के 45 से.मी. गढ्ढे एक दूसरे से 1.5 -2.5 मी. की दूरी पर खोदें। इन्हे एक सप्ताह तक खुला रखने के बाद खाद एवं उर्वरक मिला कर गढ्ढों में भरें। इसके बाद वृत्ताकार थाला बनाकर उसमें 2-2.4 से. मी. की गहराई पर 3-4 बीज प्रति थाल बो कर महीन मृदा या गोबर की खाद से ढँक दें। अंकुरण के बाद प्रति थाल 2 पौधे छोड़ कर शेष पौधे उखाड़ दें।
  2. गहरा गढ्ढा विधि – यह विधि नदी के किनारों पर अपनायी जाती हैं। इसमें 60-75 से.मी. व्यास के 1-1.5 मी. गहरे व एक दूसरे से 1.5-2.5 मी. की दूरी पर गढ्ढे बनायें। इसमें सतह से 30-40 से.मी. की गहराई तक मृदा, खाद एवं उर्वरक का मिश्रण भरें। शेष क्रिया उथला गढ्ढा विधि अनुसार ही करें।
  3. इस विधि में लगभग दो मीटर चैड़ी एवं जमीन से उठी हुई पट्टियाँ बनाकर उनके किनारे पर 1-1.5 मी. की दूरी पर बीज बोयें।

खाद एवं उर्वरक(Fertilizers for Watermelon and Muskmelon)

तरबूज एवं खरबूज के लिये 250-300 क्विंटल गोबर की खाद/कम्पोस्ट, 60-80 किलोग्राम नत्रजन, 50 किलोग्राम फ़ॉस्फ़ोरस एवं 50 किलाग्राम पोटाश, 1 हेक्टेयर क्षेत्र के लिये आवश्यक होता हैं। गोबर की खाद/कम्पोस्ट, पोटाश, स्फुर की सम्पूर्ण एवं नत्रजन की 1/3 मात्रा बोने के पहले दें। बची हुई नत्रजन की मात्रा बोने के 25 एवं 45 दिनों बाद दें।

 

सिंचाई(Irrigation of Watermelon and Muskmelon)

ग्रीष्म ऋतु की फसल होने के कारण एवं बलुई दोमट एवं बलुई मृदा में उगाई जाने के कारण सिंचाई की कम अन्तराल पर आवश्यकता होती हैं। नदी के किनारे लगाई गई फसल को पौधों के स्थापित होने तक ही सिंचाई ही आवश्यकता होती हैं। अन्य स्थानों पर तीसरे या चैथे दिन सिंचाई करें।

 

नींदा नियंत्रण(Weed control)

जब पौधे छोटे हो उस समय तक दो बार अच्छी तरह गुड़ाई कर खेत के पूरे खरपतवार निकाल दें। बेलें बढ़ने पर खरपतवारों की वृद्धि रूक जाती हैं। नींदा नियंत्रण के लिये एलाक्लोर 50 ई.सी. 2 लीटर सक्रिय तत्व 1 हेक्टेयर या ब्यटाक्लोर 50 ई.सी. 2 लीटर सक्रिय तत्व प्रति हेक्टेयर दर से बोनी के बाद एवं अंकुरण पूर्व छिड़काव कर मृदा में मिला दें (गुड़ाई करें)। छिड़काव हेतु फ्लैट पैन नोबल से 500 लीटर पानी दें।

 

हार्मोन उपचार

पौधों पर 2 एवं 4 पत्तियों की अवस्था पर इथ्रेल के 250 पी.पी.एम. साध्रता वाले घोल के छिड़काव कर उपज प्राप्त करें।

 

पौध संरक्षण(Plant protection)

क) तरबूज एवं खरबूज के कीट (Insect pests of Watermelon and Muskmelon) 

1.कद्दू का लाल कीड़ा

इसकी इल्लियाँ जड़ों को नुकसान पहुँचाती हैं। बीटल/श्रृंग पत्तियों को खा कर छेद बना देती हैं। अधिक प्रकोप की दशा में कीड़े सभी पत्ते चट कर जाते हैं।

रोकथाम

कार्बोरिल 5 प्रतिशत डस्ट 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करें। इण्डोसल्फान 35 ई.सी. या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 1200-1500 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें।

2.फल की मक्खी

इसकी इल्ली (मैगट) फलों में छिद्र बना कर खाती हैं जिससे फल खाने योग्य नही रह जाते।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिये मेलाथियान 50 ई.सी. के हिसाब से छिड़काव करें । जहरीला प्रपंच जिसमें 10 लीटर पानी, 1 किलो गुड़, 50 सी.सी. सिरका तथा 20 मि.ली. मेलाथियान 50 ई.सी. मिलाकर चैड़े मुँह वाले पात्रों में रखें। इस प्रपंच पर मक्खियाँ आकर्षित होकर गिर कर मर जाती हैं। मरी हुई मक्खियों को निकाल कर मिट्टी में दबा दें। फल मक्खी से ग्रसित फलों को नष्ट कर दें।

 

ख) तरबूज एवं खरबूज के रोग(Diseases of Watermelon and Muskmelon)

1.बुकनी रोग (पाऊडरी मिल्ड्यू)

इसमें पत्तियों पर सफेद पाऊडर (चूर्ण)  जमा हो जाता है जिससे प्रकाश संष्लेषण में बाधा आती हैं व पैदावार कम हो जाती हैं।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिये केराथेन 0.05 प्रतिशत या सल्फेक्स 0.3 प्रतिशत अथवा कार्बेन्डाज़िम 0.01 प्रतिशत का 2-3 बार 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।

2.मृदुरोमिल आसिता

इसमें पत्तियों की उपरी सतह पर पीले या हल्के लाल-भूरे धब्बे पड़ जाते हैं तथा निचली सतह पर गुलाबी चूर्ण जम जाता हैं।

रोकथाम

इसके नियंत्रण के लिये मैंकोजेब की 0.3 प्रतिशत सान्द्रता वाली दवा का 7-10 दिन के अन्तराल पर आवश्यकतानुसार 3-4 छिड़काव करें।

3.श्याम वर्ण (एन्थे्रकनोज़)

ठसमें पत्तियों पर कोणीय या गोल भूरे रंग के धब्बे बनते हैं जिनके एक-दूसरे से मिलने पर झुलसने का लक्षण प्रकट होता हैं। फल पर भी भूरे-काले धब्बे बनते हैं। यह बीमारी अधिक आर्द्रता वाले वातावरण में अधिक पनपती हैं।

रोकथाम

इसके नियंत्रण के लिये बीजो को कार्बोडाजिम 1 ग्रा. दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोयें। बेलों पर 0.22 प्रतिशत मैकोजेब 0.1 प्रतिशत दवा का छिड़काव करें।

4.म्लानि (फ्यूजेरियम विल्ट) या उगठा

यह रोग पौधें को अंकुरण से लेकर किसी भी अवस्था पर प्रभावित कर सकता हैं। पौध अवस्था में आद्रगलन होकर पौधे मर जाते हैं। परिपक्व अवस्था में पत्ती पर षीर्ष जलन के लक्षण आते हैं बाद में पौधे मुरझाने लगता हैं तथा अन्ततः उसकी मृत्यु हो जाती हैं।

रोकथाम

बीजों को 2.5 ग्राम कार्बाडाजिम दवा से प्रति किलो बीज की दर से उपचारित कर बोयें। इस बीमारी से संक्रमित जमीन में 3-4 वर्ष तक कोई भी फसल न लें।

 

फलों की तुड़ाई

फलों की सही अवस्था पर तुड़ाई करें। फलों के पकने की पहचान निम्नलिखित तरीकों से करते हैं।

तरबूज
  1. फलों को अंगुलियों से धप-धप की आवाज़ निकले तथा डाल (डंडरैल) सूख जावें।
  2. फल का पैंदा जो भूमि में रहता है यदि सफेद से पीला हो जाये तो फल पका हुआ समझें।
  3. दबाने पर यदि फल दब जाता है एवं हाथों से ज्यादा ताकत नही लगानी पड़ती तो फल पका हुआ समझें।

प्रत्येक किस्म के फल के पकने का समय अलग-अलग होता हैं। साधारणतः फल लगने से पकने तक 30-35 दिन लगते हैं। तुड़ाई के समय फल में करीब 4-5 से.मी. डंठल लगे रहने से फल में सड़न व्याधि नही आती।

खरबूज
  1. परिपक्वता के समय फल के आधार भाग में पुष्प दंड के निकट एक गोलाकार दरार दिखाई देने लगती हैं। पूर्ण पकने पर फल बेल से आसानी से अलग हो जाती हैं।
  2. पुष्पवृन्त के आधार का रंग हरे से मोम के रंग का होने लगता हैं।
  3. फलों से एक विशेष प्रकार की गंध आने लगती हैं।
  4. फलों के छिलके का रंग हरा से पीला होने लगता हैं। तथा फल पकने पर नर्म हो जाता हैं।

 

उपज( Yield per acre)

अनुशंसित कृषि कार्यमाला के अनुपालन से तरबूज की 400 से 600 क्विं. एवं खरबूज की 200-250 क्विं प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं।

 

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya,jabalpur,Madhya Pradesh.

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