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गेहूँ की खेती-राजस्थान - Kisan Suvidha
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गेहूँ की खेती-राजस्थान

गेहूँ की खेती

गेहूँ की खेती-राजस्थान

गेहूँ रबी ऋतु में उगाई जाने वाली अनाज की प्रमुख फसल है । इसके द्वारा अनाज के साथ-साथ भूसे के रूप में  अच्छा चारा भी प्राप्त होता है । राज्य में गेहूँ  की फसल लगभग 29 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में उगायी जाती है । पश्चिमी क्षेत्र में भी गेहूँ  की खेती लगभग 10.6 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में होती है । लेकिन गेहूँ  की औसत उपज लगभग 2900 कि.ग्रा. प्रति हैक्टेयर है । निम्न उन्नत तकनीकों के प्रयोग द्वारा औसत उपज में 25 से 50 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी की जा सकती है ।

 

गेहूँ की उन्नत किस्में

अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए उन्नत किस्मों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । गेहूँ की पैदावार बढ़ाने के लिए निम्नलिखित किस्मों का प्रयोग किया जा सकता है ।

किस्म पकने की अवधि (दिनों में) औसत उपज (कु./है.) विशेषताएं
राज-3077 120-122 45-50 साधारण लवणीय भूमि के लिए उपयुक्त, रोली रोधक |
राज-3765 115-120 40-45 रोली रोधक, दाना सुनहरा एवं मोटा देरी से बुवाई में भी अच्छी पैदावार |
डब्लू एच-147 130-140 40-45 देरी से बुवाई के लिए उपयुक्त, रोली रोधक |
पी बी डब्ल्यू-373 120-130 45-50 दाने बड़े, शरबती व हल्की दोमट भूमि के लिए उपयुक्त |
राज-4037 120-125 45-50 कल्ले काफी फूटते है | रोग रोधी, अधिक पैदावार |
राज-1482 120-130 40-45 अधिक दाने की उपज, रोग रोधी|
खारचिया-65 135-145 30-35 अधिक क्षारीय भूमि के लिए उपयुक्त, काली रोली रोधक, लाल रंग के दाने |

 

भूमि एवं उसकी तैयारी

गेहूँ की खेती के लिए दोमट व बलुई दोमट भूमि उपयुक्त होती है । भूमि में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए तथा अच्छी उर्वरा शक्ति युक्त होनी चाहिए । प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या डिस्क हैरो से करनी चाहिए । इसके पश्चात् हैरो द्वारा क्रास जुताई करके कल्टीवेटर से एक जुताई करके पाटा लगाकर भूमि समतल कर देनी चाहिए ।

 

बीज दर एवं बुवाई

अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए पौधों की उचित संख्या होनी आवश्यक है । गेहूँ की बुवाई सामान्य समय पर की जाये तो 100 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त रहता है । यदि फसल की बुवाई देरी से की जाए तो बीज की मात्रा में 25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर देनी चाहिए । गेहूँ की बुवाई का उचित समय नवम्बर के प्रथम सप्ताह से तीसरे सप्ताह तक का है । देरी से बुवाई 15 दिसम्बर तक कर देनी चाहिए । गेहूँ की बुवाई पंक्तियों में करनी चाहिए । पंक्ति से पंक्ति की दूरी 22.5 से 25 सेंटीमीटर पर्याप्त होती है । जहाँ तक संभव हो सके, पलेवा देकर ही बुवाई करनी चाहिए । इससे खेत में खरपतवारों की संख्या कम, फसल का जमाव अच्छा एवं बढ़वार अच्छी होती है ।

 

खाद एवं उर्वरक प्रबंधन

फसल की अच्छी पैदावार प्राप्त करने हेतु उचित मात्रा में खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है । खेत में अच्छी सड़ी हुई गोबर या कम्पोस्ट खाद दो या तीन साल में 8 से 10 टन प्रति हैक्टेयर की दर से अवश्य देनी चाहिए । इसके अतिरिक्त गेहूँ की फसल को 100 कि.ग्रा. नाइट्रोजन एवं 60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर की आवश्यकता होती है । नाइट्रोजन की आधी एवं फास्फोरस की समस्त मात्रा बुवाई के समय पंक्तियों में देनी चाहिए । उर्वरकों की यह मात्रा 130.50 कि.ग्रा. डी.ए.पी. व 58 कि.ग्रा. यूरिया के द्वारा दी जा सकती है ।

इसके पश्चात् नाइट्रोजन की आधी मात्रा दो बराबर भागों में देनी चाहिए । जिसे बुवाई के बाद प्रथम व द्वितीय सिंचाई देने के तुरंत बाद छिड़क देना चाहिए । गेहूँ की फसल में जस्ते (जिंक) की कमी भी महसूस की जा रही है । इसके लिए जिंक सल्फेट की 25 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भूमि में बुवाई से पूर्व देनी चाहिए लेकिन इससे पहले मृदा परीक्षण आवश्यक है ।

 

सिंचाई

गेहूँ की फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए उचित अवस्था पर सिंचाई करनी महत्वपूर्ण होती है । प्रथम सिंचाई बुवाई के 20-25 दिन बाद करनी चाहिए । इस समय पौधे की शीर्ष जड़ें बनती हैं । यह बहुत ही महत्वपूर्ण सिंचाई होती है। दूसरी सिंचाई बुवाई के 45-50 दिन बाद (फूटान के समय), तीसरी सिंचाई 60-65 दिन पश्चात् (गांठ बनते समय), चैथी सिंचाई 80-85 दिन बाद (बाली आने पर), पाँचवीं सिंचाई 100-105 दिन बाद (दूधिया अवस्था पर) एवं अंतिम सिंचाई 115 से 120 दिन बाद (दाना पकते समय) करनी चाहिए । अंतिम सिंचाई से दानों का पूर्ण विकास होता है । जहाँ तक संभव हो सकते सिंचाई फव्वारे विधि द्वारा करना चाहिए ।

 

खरपतवार नियंत्रण

गेहूँ की फसल में चैड़ी एवं नुकीली पत्ती वाले अनेक खरपतवार जैसे गोयला, चील, पीली सैंजी, प्याजी, गुल्ली डंडा, जंगली जई इत्यादि नुकसान पहुँचाते हैं । फसल की बुवाई के दो दिन पश्चात् तक पेन्डीमैथालीन (स्टोम्प) नामक खरपतावार नाशी की बाजार में उपलब्ध 3.30 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव करना चाहिए । इसके उपरान्त फसल जब 30-35 दिन की हो जाए तो बाजार में उपलब्ध 2, 4-डी एस्टर साल्ट 72 ई.सी. की 1 लीटर मात्रा को 500 लीटर पानी में घोल बनाकर समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए । खेत में यदि गुल्ली डंडा, जंगली जई एवं फ्लेरिस माइनर की अधिक समस्या हो तो आइसाप्रोटरोन की बाजार में उपलब्ध 2 किलो मात्रा को प्रति हैक्टेयर की दर से बुवाई के 25-30 दिन पश्चात् छिड़काव कर देना चाहिए ।

 

जिप्सम का प्रयोग

जिन भूमियों का पी एच मान 8 या इससे अधिक हो उन भूमियों में मिट्टी की जांच के अनुसार जिप्सम का प्रयोग करना चाहिए । जिप्सम वर्षा ऋतु में भूमि में मिलाया जा सकता है । यह बुवाई से पूर्व भी खेत में मिलाया जा सकता है । क्षारीय भूमियों में राज – 3077, के आर एल 1 – 4, खारचिया-65 एवं एच डी-1981 किस्मों का प्रयोग करना चाहिए ।

 

गेहूं के कीट एवं रोग

१.दीमक:-

दीमक गेहूँ के पौधों की जड़ें काटकर फसल को बहुत हानि पहुँचाती है । दीमक की रोकथाम के लिए अंतिम जुताई के समय खेत में क्लोरोपाइरीफाॅस या क्यूनालफाॅस की 20-25 कि.ग्रा. मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से भुरक कर मिट्टी में मिला देना चाहिए । बीज को क्लोरोपायरीफोस की 2 मिली. मात्रा द्वारा प्रति किलो बीज दर से उपचारित कर बुवाई करनी चाहिए । इसके अतिरिक्त खड़ी फसल में क्लोरोपाइरीफोस कीट नाशक की 2 लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से सिंचाई के पानी के साथ देना लाभदायक रहता है ।

२.मोयला (एफीड) व जैसीडस:-

ये कीट पत्तियों व पौधे की बालियों से रस चूसकर फसल को हानि पहुँचाते हैं । इनके नियंत्रण के लिए इमीडाक्लोरोप्रिड की आधा लीटर या मोनोक्रोटोफास की 1 लीटर या मैलाथियौन की एक लीटर या ऐसीफैट की 500 ग्राम या इकालक्स की एक लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव किया जा सकता है ।

३.शूट फलाई:-

यह कीट पौधे की नई पत्तियों से रस चूसती है इसके कारण पौधे की पत्तियां पीली पड़ जाती हैं इस मक्खी की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफास 36 एस एल की आधा लीटर या फोसोलोन 35 ई.सी. की 0.75 लीटर मात्रा 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देना चाहिए ।

४.भूरी मकड़ी व तेला:-

भूरी मकड़ी का प्रकोप दिसम्बर में अधिक होता है तथा इसके प्रौढ़ व शिशु पत्तियों से रस चूसते हैं तथा पत्तियाँ हल्के रंग की हो जाती हैं । बीज कम बनते हैं तथा छोटे आकार के रह जाते हैं । भूरी मकड़ी व तेला की रोकथाम के लिए डायमिथोएट 30 ई.सी. एक लीटर या मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. या फार्मोथियोन 25 ई.सी. की एक लीटर मात्रा प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव कर देनी चाहिए ।

५.चूहा नियंत्रण:-

चूहे गेहूँ की फसल को बहुत नुकसान पहुँचाते हैं । चूहों को नियंत्रित करने के लिए चूहों के बिलों में जिंक फास्फाइड का बना चुग्गा प्रयोग करके चूहों को नष्ट किया जा सकता है । एल्युमिनियम फास्फाइड की 1 ग्राम की गोली प्रति बिल में डालकर भी चूहों को समाप्त किया जा सकता है । अनाज भंडारित जगह पर ब्रोमेडियोलोन 0.005 प्रतिशत चूहानाशक टिकियों द्वारा चूहों को मारा जा सकता है । लेकिन ध्यान रहे चूहा विष को बच्चों एवं पालतू जानवरों की पहुंच से दूर रखना चाहिए ।

६.पीला/काला रतुआ:-

पीले रतुआ के कारण पत्तियों पर पीले रंग के छोटे-छोटे कतारों में फफोले बन जाते हैं । जब कि काले रतुआ द्वारा पत्तियों की डंठलों एवं तनों पर लाल भूरे से काले रंग के लम्बे धब्बे बन जाते हैं । इन रोगों के नियंत्रण के लिए रोग रोधी किस्में जैसे राज-3077, राज-1482 व राज-3777 किस्मों की बुवाई करनी चाहिए । रोग के लक्षण प्रकट होते ही गंधक का पाउडर 25 किलो ग्राम प्रति हैक्टेयर का भुरकाव व 2 किलो मैन्कोजेब प्रति हैक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर 15 दिन के अंतराल से 2-3 छिड़काव करने चाहिए ।

७.अनावृत कण्डुआ रोग:-

इस रोग के कारण गेहूँ की बाली काले पाउडर के रूप् में बदल जाती है । इस रोग के निंयत्रण के लिए 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम नामक फफूँदनाशक से प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोना चाहिए । रोग ग्रसित पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए ।

८.टुण्डु रोग:-

इस रोग के कारण पौधों की बालियां छोटी तथा मोटी हो जाती हैं इनमें दानों की जगह हरे रंग के विकृत आकृति की गेंगले बन जाती हैं तथा बाद में भूरे काले रंग के हो जाते हैं । ये गेंगले सूत्रकृमिक के अण्डों से भरी होती है पत्तियों एवं बालियों में एक पीले रंग का गोंद जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है । इसके नियंत्रण के लिए बीज को 20ः नमक के पानी के घोल से उपचारित कर साफ पानी से धोकर छाया में सुखाकर बोना चाहिए ।

९..सूत्रकृमी की समस्या:-

गेहूँ में सूत्रकृमी पौधे की जड़ों को हानि पहुंचाते हैं । पौधे की बढ़वार कम होती है तथा पौधा पीला पड़ जाता है । पौधे में फुटान कम होता है, बालियां कम बनती हैं तथा छोटी रह जाती हैं । इस रोग की रोकथाम के लिए उचित फसल चक्र अपनाना चाहिए । गेहूँ की जगह सरसों, चना इत्यादि फसलें उगानी चाहिए । खेत में बुवाई से पहले 45 कि.ग्रा. कार्बोफ्यूरोन 3 प्रतिशत कण प्रति हैक्टेयर की दर से 10 किलो यूरिया के साथ मिलाकर देना चाहिए ।

फसलों के प्रमुख पुट्टीकारी सूत्रकृमि रोग एवं प्रबंधन

 

पाले से बचाव

जब पाले पड़ने की सम्भावना हो तो खेत में सिंचाई कर देनी चाहिए । फसल पर 1 लीटर पानी में एक मि.ली. तनु गंधक का तेजाब (सल्फ्यूरिक अम्ल) मिलाकर छिड़काव कर देना चाहिए । खेत के चारो और धुँआ करना भी लाभदायक रहता है ।

 

फसल चक्र

राज्य के पश्चिमी भाग के सिंचित क्षेत्र में एक दो एवं तीन वर्षों के फसल चक्र प्रयोग किये जा सकते हैं।

  • मूंग/ग्वार/बाजरा – गेहूँ – एक वर्ष
  • मूंग – गेहूँ – बाजरा – सरसों – दो वर्ष
  • बाजरा – गेहूँ – मूंग / ग्वार – सरसों / जीरा – दो वर्ष
  • बाजरा – गेहूँ – मूंग / ग्वार – गेहूँ – बाजरा – सरसों तीन वर्ष

फसल चक्र द्वारा फसलों में खरपतवार, कीड़े एवं बीमारियों की समस्या कम होती है । भूमि की उर्वराशक्ति बढ़ती है तथा फसलों की पैदावार बढ़ती है । अतः फसल चक्र अपनाना आवश्यक है ।

 

बीज उत्पादन

गेहूँ का बीज उत्पादन किसान स्वयं कर सकता है । तथा प्रत्येक वर्ष बाजार से बीज खरीदने की आवश्यकता नहीं होती । गेहूँ के बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए जिसमें पिछले वर्ष गेहूँ की खेती न की गई हो तथा भूमि की उर्वरा शक्ति अच्छी होनी चाहिए । जल निकास की उचित व्यवस्था हो, खेत के चारों ओर 150 मीटर तक गेहूँ का अन्य खेत न हो, क्योंकि कन्डुआ रोग गेहूँ के एक खेत से दूसरे खेत में आसानी से फैल जाता है । सामान्य स्थिति में 5 से 10 मीटर पृथककरण दूरी पर्याप्त होती है । बीज उत्पादन हेतु प्रमुख कृषि क्रियाऐं तथा फसल सुरक्षा का विशेष ध्यान रखना चाहिए । प्रमाणित बीज की बुवाई करनी चाहिए । तथा खेत में खरपतवारों विशेष रूप से फेलेरिस माइनर व हिरनखुरी का ध्यान रखना चाहिए ।

खेत में अनावृत कण्डुवा से ग्रसित एक भी पौधा नहीं होना चाहिए । अवांछनीय पौधों को दिखाई देते ही निकाल देना चाहिए । फसल की कटाई खेत के चारों तरफ 10 मीटर क्षेत्र छोड़ते हुए लाटा काटकर अलग जगह इकट्ठा करके सुखाना चाहिए । सूखने के पश्चात् दाना भूसे से थ्रैसर द्वारा अलग कर लिया जाता है । इस दाने को साफ करके ग्रेडिंग कर अच्छी प्रकार सुखा लेना चाहिए । दाने में 8-9 प्रतिशत से अधिक नमीं नहीं होनी चाहिए । बीज को फफूंद नाशक एवं कीटनाशक से उपचारित कर लोहे की टंकी या साफ बोरे में भरकर सुरक्षित जगह भण्डारित कर लेना चाहिए । इस प्रकार उत्पन्न किए गए बीज की किसान अगले वर्ष बुवाई कर सकते हैं ।

 

कटाई एवं गहाई

जब फसल के पौधे पीले पड़ जायें तथा दानों में नमीं 15 प्रतिशत से अधिक न हो तो फसल की कटाई कर लेना चाहिए । लाटे को अच्छी प्रकार सुखाकर थ्रैसर द्वारा दाने को अलग कर लेना चाहिए तथा साफ कर सुखाकर बोरों में भर लेना चाहिए ।

 

उपज एवं आर्थिक लाभ

उन्नत विधियों द्वारा खेती करने से गेहूँ की औसत दाने की उपज 40 से 45 कुंटल तथा भूसे की 50-55 क्विंटल प्रति हैक्टेयर प्राप्त हो जाती है । गेहूँ की एक हैक्टेयर खेती करने पर लगभग 30 हजार रुपयों का खर्च आ जाता है ।

 

 

स्रोत-

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