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गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक - Kisan Suvidha
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गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक

एस.एस.आई.

गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक

गन्ना फसल की भारी जल मांग, गिरते भूजल स्तर तथा रासायनिको के  बढ़ते उपयोग को  देखते हुए पारस्थितिक समस्यायें भी बढ़ रही है । अब समय आ गया है कि हमें प्रकृति मित्रवत खेती में कम लागत के  उन्नत तौर तरीके  अपनाने की आवश्यकता है जिससे प्राकृतिक संसाधनो का कुशल प्रबन्धन करते हुए गन्ना फसल से अधिकतम लाभ अर्जित किया जा सके । इस परिपेक्ष्य में धान का उत्पादन बढाने में हाल ही में अपनाई गई “श्री विधि” कारगर साबित हो  रही है। इसी तारतम्य में हैदराबाद स्थित इक्रीसेट व डब्लू.डब्लू.एफ. प्रोजेक्ट ने गन्ना उत्पादन की एस.एस.आई. तकनीक का विकास किया है, जिसके उत्साहजनक परिणाम प्राप्त हो रहे है।

एस.एस.आई.अर्थात सस्टेनेबल सुगरकेन इनीशियेटिव (दीर्धकालीन गन्ना उत्पादन तकनीक) गन्ना उत्पादन की वह विधि है जिसमें गन्ने से प्रति इकाई अधिकतम उत्पादन लेने न्यूनतम बीज और  कम पानी में भूमि व उर्वरकों  का कुशल उपयोग किया जाता है । वास्तव में यह बीज, जल और  भूमि का गहन उपयोग करने वाली गन्ना उत्पादन की नवीन वैकल्पिक विधि है । दरअसल, पर्यावरण को  क्षति पहुँचाये बिना प्रति इकाई जल, जमीन और  श्रम से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने की यह नवीन अवधारणा है, जिसके  प्रमुख सूत्र इस प्रकार हैः

1.    गन्ने की एकल कलिका वाले टुकडो का प्रयोग करते हुए पौधशाला स्थापित करना

2.    कम आयु (25-35 दिन) की पौध रोपण

3.    मुख्य खेत में पौधों  के   मध्य उचित फासला( 5 x 2 फीट) रखना

4.    मृदा में आवश्यक नमीं कायम रखना तथा खेत में जलभराव रोकना

5.    जैविक माध्यम से पोषक तत्व प्रबंधन व कीट-रोग प्रबंधन

6.    भूमि और  अन्य संसाधनो  का  प्रभावकारी उपयोग हेतु अन्तर्वर्ती फसलें लगाना ।

गन्ना लगाने की पारंपरिक विधि में रोपाई हेतु 2-3 आँख वाले टुकडॉ का उपयोग किया जाता है। एस.एस.आई. विधि में स्वस्थ गन्ने से सावधानी पूर्वक एक-एक कलिकाएं निकालकर पौधशाला (कोको पिथ से भरी ट्रे) में लगाया जाता है । मुख्य खेत में 25-35 दिन की पौध रोपी जाती है । पौधशाला में एक माह में पौधों  की वृद्धि बहुत अच्छी हो  जाती है। पारंपरिक विधि में एक एकड़ से 44000  गन्ना प्राप्त करने हेतु दो  कतारों के  मध्य 45 से 75 सेमी.(1.5-2.5 फीट) की दूरी रखी जाती है और  प्रति एकड़ तीन आँख वाले 16000 टुकड़े (48000 आँखे) सीधे खेत में  रोप दी जाती है ।

परन्तु अंत में सिर्फ 25000 पिराई योग्य गन्ना ही प्राप्त हो  पाता है । जबकि एस.एस.आई. विधि में अधिक फासलें (कतारों  के  मध्य 5 फीट और  पौधों  के  मध्य 2 फीट) में रो पाई करने से कंसे अधिक बनते है जिससे 45000 से 55000 पिराई योग्य गन्ना प्राप्त हो  सकता है । इस प्रकार से कतारों  व पौधों  के  मध्य चौड़ा फासला रखने से न केवल कम बीज ( तीन आँख वाले 16000 टुकड़¨ं की अपेक्षा एक आँख वाले 5000 टुकड़े) लगता है बल्कि इससे प्रत्येक पौधे को हवा व प्रकाश सुगमता से उपलब्ध होता रहता है जिससे उनका समुचित विकास होता है ।

एस.एस.आई. विधि में जल प्रबंध पर विशेष ध्यान दिया जाता है । खेत में पर्याप्त नमीं बनाये रखना लाभकारी पाया गया है । बाढ. विधि से सिंचाई करने से पानी कि अधिक मात्रा तो लगती ही है, पौधों  की बढ़वार पर भी बिपरीत प्रभाव पड़ता है । पौधशाला में पौध तैयार करना, कूड़ या एकान्तर कूड़ विधि या टपक विधि से आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से 40 प्रतिशत तक जल की वचत संभावित है ।

दीर्धकाल तक अधिक उत्पादन प्राप्त करने हेतु रासायनिक उर्वरको  और  कीटनाशको  पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता है । इसके  लिए जैविक खाद व जैव उर्वरकों  का प्रयोग किया जाना आवश्यक है । समन्वित     पोषक तत्व प्रबंधन करना अधिक लाभकारी पाया गया है  । एस.एस.आई. विधि में गन्ने की दो  कतारों के  बीच गेंहू, चना, आलू, राजमा, बरवटी, तरबूज, बैगन आदि फसलों की अन्र्तवर्ती खेती को  प्रोत्साहित किया जाता है । इससे भूमि, जल आदि संसाधनों का कुशल उपयोग होने के साथ-साथ खरपतवार भी  नियंत्रित रहते है और  किसानो  को  अतिरिक्त आमदनी भी प्राप्त हो  जाती है ।

 

Source-

  • kisanhelp.in

Comments:

  • AS.Ovireddy
    22/06/2017 at 1:39 PM

    Regarding sugercane article, kindly put an English translation, so as to enable us to be benefited.

    • Admin
      23/06/2017 at 9:03 AM

      ok, we will try to arrange the article in English language. Thankyou