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केले के रोग एवं प्रबंधन - Kisan Suvidha
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केले के रोग एवं प्रबंधन

केले के रोग

केले के रोग एवं प्रबंधन

केले में लगने वाली प्रमुख बीमारियां एवं उनका नियंत्रण:-

1. सिगाटोका लीफ स्पाट

लक्षण:

यह केले में लगने वाली एक प्रमुख बीमारी है इसके प्रकोप से पत्ती के साथ साथ घेर के वजन एवं गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। शुरू में पत्ती के उपरी सतह पर पीले धब्बे बनना शुरू होते है जो बाद में बड़े भूरे परिपक्व धब्बों में बदल जाते है।धब्बों का केन्द्र भाग भूरा पीले खोखले भाग के साथ विकसित होता है। यह पत्ती के किनारे एवं अग्र भाग पर ज्यादा पाया जाता है। पत्ती पर धब्बों का आकार अण्डाकार होता है, संवेदनषील जातियों मे 2-3 पत्तीयों को छोडकर बाकी सभी पत्तीयां प्रभावित होती है।

प्रबंधन:
समेकित प्रबन्धन
  • रोपाई के 4-5 महीने के बाद से ही लगातार ग्रसित पत्तियों को काटकर खेत से बाहर जला दें।
  • दूसरी कृषि क्रियायें जैसे समय पर अवाछिंत प्रकन्दों को अलग करना, खेत को खरपतवार मुक्त रखना, उचित जलनिकास एवं अनषसिंत दूरी पर रोपाई करके बीमारी की तीव्रता को कम किया जा सकता है।
  • अधिक आर्द्रता बीमारी को बढ़ावा देती है जो कि खेत के वातावरण को परिवर्तीत कर नियंत्रित किया जा सकता है। पर्याप्त मात्रा में खेत के अन्दर हवा एवं सूर्य की किरणों का आवागमन बनाउ रखने के लिए अनुषंसित दूरी पर रोपाई करें। किसी भी दशा में 2 प्रकन्द प्रति पौधा से ज्यादा न रखे।
  • जल भराव की स्थिति में आर्दता के बढ़ने से बीमारी का प्रभाव बढ़ता है इसलिये जल निकास का समुचित प्रबन्ध केला बगानों में करना चाहिये।
  • राष्ट्रीय केला अनुसंधान सस्थान, त्रिची द्वारा अनुषसिंत नीचे बताये गये फफंूदनाशकों का छिड़काव 20 दिनों के अन्तराल पर इस बीमारी के प्रबन्धन में काफी प्रभावी पाया गया है।
छिडकाव विवरण फफूंदनाशकों की मात्रा / लीटर पानी में
पहला छिडकाव कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम बनोल आयल 8 मि. लीटर
दूसरा छिडकाव प्रोपिकोनाजोल 1 एम. एल. बनोल आयल 8 मि. लीटर
तीसरा छिडकाव काम्पेनियन 1 ग्राम बनोल आयल 8 मि. लीटर
चौथा छिडकाव ट्राइडमार्फ़ 1 ग्राम बनोल आयल 8 मि. लीटर

आवश्यकतानुसार पांचवा एवं छठा छिड़काव पुनः प्रोपिकोनाजोल एवं काम्पेनियन उपरोक्त मात्रा के अनुसार कर सकते हैं । दवा छिड़काव से पहले ग्रसित पत्तियों को कटाई करके खेत से बाहर निकालना नितांत आवश्यक है । अधिक तापमान की दशा में बनोल आयल का प्रयोग न करें

 

2  पत्ती गुच्छा रोग

लक्षण:
  •  यह एक वायरस जनित बीमारी है पत्तियों का आकार बहुत ही छोटा होकर गुच्छे के रूप में परिवर्तित हो जाता है। ये असमान्य लक्षण गहरे रंग की रेखाओं मे एक इंच या ज्यादा लम्बे अनियमित किनारों के साथ होते है। यदि बीमारी से प्रभावित पत्तियों को लगाया जाये तो पौधो की वृद्धि बहुत कम होती है, एवं उसमे फूल नही आता। यदि पौधे मे बाद मे रोग लगता है तो घेर का आकार अच्छी घेर का लगभग एक तिहाई होता है।
प्रबंधन:
  • ग्रसित पौधों को अविलंब उखाड कर मिट्टी में दबा दें या जला दें।
  •  फसल चक्र अपनायें।
  •  कन्द को संक्रमण मुक्त खेत से लें।
  • पत्तियों की कटाई छटाई करके चयनित पुत्तियों को 0.5 प्रतिषत मोनोक्रोटोफास (5 एमएल/लीटर) एवं 0.1 प्रतिषत (1 ग्राम/लीटर) कार्बेन्डाजिम के घोल मे 5 मिनट डूबोकर उपयोग करना चाहिये।
  • एक केला बागान से दूसरे केला बागान के बीच की दूरी कम से कम 100-200 मीटर जिससे विषाणु के फैलाव को रोका जा सके।
  • रोगवाहक कीट के नियन्त्रण हेतु इमीडाक्लोप्रिड 1 मि.ली./लीटर या मेटासिस्टाक्स (1-5 एमएल/ली.) पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे। इसके अलावा मोनोक्रोटोफास का घोल (1: 4 अनुपात) 30 दिनांे के अन्तराल पर रोपाई के 2-3 महीने के बाद सुई के माध्यम से पौधे के तनो मे दिलवायें।

3. जड़ गलन

लक्षण:
  •   इस बीमारी के अंतर्गत पौधे की जड़े गल कर सड़ जाती है एवं बरसात एवं तेज हवा के कारण गिर जाती है।
प्रबंधन:
  • खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करें।
  • रोपाई के पहले कन्द को फफूंदनाशी कार्बन्डाजिम 2 ग्राम/लीटर पानी के घोले से उपचारित करे।
  • रोकथाम के लिये काॅपर आक्सीक्लोराइड दवा 50 ग्राम तथा स्ट्रेप्टोसाइक्लिन 3 ग्राम /15 लीटर पम्प में घोलकर 10 दिन के
  • अन्तराल पर दो बार ड्रेचिग जड के पास करे। ध्यान रहे स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को थोडे गर्म पानी मे घोलकर पम्प मे डालें ।

 

 

स्रोत-

  • कृषि विज्ञान केन्द्र, बुरहानपुर,मध्यप्रदेश

 

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