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कद्दू एवं कुम्हड़ा की खेती ( Pumpkin cultivation ) -मध्यप्रदेश - Kisan Suvidha
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कद्दू एवं कुम्हड़ा की खेती ( Pumpkin cultivation ) -मध्यप्रदेश

कद्दू की खेती

कद्दू एवं कुम्हड़ा की खेती ( Pumpkin cultivation ) -मध्यप्रदेश

परिचय(Introduction)

कद्दूवर्गीय सब्जियों में कद्दू एवं कुम्हड़ा का विशेष स्थान हैं। कद्दू के अन्तर्गत तीन जातियाँ काशीफल या लाल कद्दू (कुकुरबिटा मोस्केटा), छप्पन कद्दू (कुकुरविटा पीपो) एवं बिलायती कद्दू (कुकुरबिटा मैक्सिमा) आती हैं। कद्दू बैंगन की खेती बृहत रूप् से करने के लिये भूमि के चयन पर विशेष ध्यान देना चाहियेजहाँ सब्जी के रूप् में खाया जाता है वही कुम्हड़ा एक प्रसिद्ध मिष्ठान पेठा बनाने में प्रयुक्त होता हैं। कद्दू के पुष्प जो कि फल से अधिक पौष्टिक होते हैं, पकोड़े बनाने में प्रयोग किये जाते हैं। कद्दू एवं कुम्हड़ा के परिपक्व फलों को कई महिनों तक संग्रह किया जा सकता हैं। ये ग्रीष्म ऋतु की फसल है अतः पाला सहन नही कर पाती हैं।

भूमि का चुनाव एवं तैयारी(Land selection and land preparation)

समुचित जल निकास वाली हल्की मृदा जिसका पी एच 6.2-6.8 हो, कद्दू एवं कुम्हड़ा की खेती के लिये उपयुक्त रहती है पर्याप्त मात्रा में कार्बनिक, जैविक खाद मिलाकर भारी मृदा में भी इनकी खेती की जा सकती हैं। हल्की मृदा में फसल जल्दी आती हैं। भूमि की तैयारी हेेतु दो जुताई के उपरांत खाद एवं उर्वरक की बतलाई गई मात्रा का भुरकाव कर तीसरी जुताई कर अच्छी तरह मिला दें।

कद्दू की उन्नत किस्में (Pumpkin varieties)

१- काशीफल

  1. अर्का चन्दन – इसके फल 2-3 किलोग्राम वजनी मध्यम आकार के चपटे होते हैं तथा दोनों छोरो पर धसे होते हैं। फल 125 दिन में परिपक्व होते हैं तथा मक्खनी रंग के धबबेयुक्त हल्के भूरे रंग के होते हैं।
  2. सी.ओ. 1 – इसके फल गोलाकार 7-10 किलोग्राम वजन के होते हैं। ये 155 दिन में परिपक्व हो जाते हैं।
  3. सी.ओ. 2 – इसके फल 1.5 से 2 किलाग्राम वजन के होते हैं जो बोआई के 135 दिन बाद परिपक्व हो जाते हैं।
  4. काशी हरित – इसकी बेल छोटी, फल 2.5-3.0 कि. ग्रा. वनज के होते हैं। इसकी उपज 300-350 क्विंटल/हेक्टेयर हैं।

२-छप्पन कद्दू

  1. पूसा अलंकार – यह एक संकर किस्म हैं जिस के फल हल्की धारियों युक्त गहरे रंग के होते हैं। प्रथम तुड़ाई 45-50 दिन बाद की जा सकती हैं।
  2. पंजाब छप्पन कद्दू – फल तस्तरी के आकार के हरे रंग के होते हैं। यह मृदु आसिता रोधी तथा विषाणु, चूर्णिल आसिता एवं कद्दू के लाल कीड़ा के प्रति सहनशील हैं। प्रथम तुड़ाई के लिये 60 दिन में तैयार हो जाती हैं।
  3. अर्ली येलो प्रोलिफिक – इसका फल मध्यम आकार का जो प्रारम्भ में हल्का पीला तथा परिपक्व अवस्था में नारंगी रंग का हो जाता हैं।

३-विलायती कद्दू

  1. अर्का सूर्यमुखी – फल गोल, छोटे दोनों छोरो पर चपटे तथा लगभग 1 किलोगाम वनज के सुगंधित एवं नारंगी रंग के होते हैं। यह 75-100 दिन में परिपक्व हो जाते हैं। यह किस्म फल मक्खी प्रतिरोधी हैं।

४-कुम्हड़ा

  1. सी.ओ. 1 – इसके फल गोलाकार, कम बीज युक्त 5-6 किलोग्राम वनज के होते हैं। ये 140 दिन में परिपक्व हो जाते हैं।
  2. सी.ओ. 2 – फल लंबे गोलाकार, 3 किलोग्राम तक वनज के होते हैं। गूदा का रंग हल्का हरा होता हैं। फल में 200-300 बीज होते हैं। यह 120 दिन हैं तथा औसत उपज 550-600 क्विं/हे. हैं।
  3. काशी धवल – यह किस्म स्थानीय किस्मों से चयन द्वारा विकसित की गई हैं। इसकी बेल की लंबाई लगभग 7.8 से.मी. होती हैं। इसके फल लंबे, गोलाकार, गूदा सफेद होता हैं। फल 11-12 कि.ग्रा. वजन के होते हैं फसल अवधि लगभग 120 दिन है तथा औसत उपज 550-600 क्विं/हे. हैं।
  4. काशी उज्जवल – इसके फल गोल, लगभग 10-12 कि.ग्रा. के होते हैं। फल का गूदा सफेद होता है जिसमें बीज एक कतार में होते हैं फसल अवधि 110-120 दिन हैं। उसकी उपज 550-600 क्विं/हे. प्राप्त होती हैं।

फसल चक्र (Crop rotation)

  1. टमाटर – फ्रेंचबीन – कद्दू
  2. भिण्डी – मटर – कद्दू
  3. बरबटी – बैंगन – कुम्हड़ा
  4. भिण्डी – आलू – कद्दू
  5. कुम्हड़ा – प्याज – कद्दू

कद्दू बोने का समय एवं बीज की मात्रा (Sowing time and seed rate for Pumpkin)

कद्दू एवं कुम्हड़ा को ग्रीष्मऋतु के लिये जनवरी से मार्च तथा वर्षा ऋतु के लिये जून-जुलाई में बंवाई करते हैं। इसको एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगाने के लिये 6-8 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है जो अंकुरण प्रतिशत, भूमि व मौसम पर निर्भर करती हैं।

बीजोपचार एवं बोने की विधि(Seed treatment and sowing method)

कद्दू एवं कुम्हड़ा को समतल भूमि, उठी हुई क्यारियों या खाद एवं मिट्टी के मिश्रण से बने ढेर पर बोया जाता हैं। उठी हुई क्यारियों की विधि में बुवाई क्यारी के किनारों पर की जाती हैं। कद्दू के लिये 2-3 मीटर की दूरी पर बनायी गई कतारों में 1.5 मीटर की दूरी पर 2-2.5 से. मीत्र गहरे बीज बोते हैं। कुम्हड़ा के लिये कतारों के बीच की दूरी 1-1.5 – 2.5 मीटर, बीज से बीज की दूरी 1 मीटर तथा गहराई 1-2 से. मी. रखते हैं। प्रति स्थान 3-4 बीज बोते हैं तथा अंकुरण के बाद दो पौधे प्रति स्थान छोड़कर शेष पौधे उखाड़ देते हैं। बीज बोने से पूर्व किसी फफूंद नाशक दवा जैसे बाविस्टीन या डायथेन एम-45, कार्बेन्डाजिम या मैन्कोजेब से 3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाकर उपचारित कर लेना चाहिये।

खेत खाली न होने पर एवं समय बचत करने के उद्देष्य से बीज को पोलीथीन की थैलियों में 1-1.5 माह पहले बो दिया जाता है तथा बाद में मुख्य खेत में रोपाई कर देते हैं।

सिंचाई(Irrigation of Pumpkin)

ग्रीष्म ऋतु में कम अन्तराल (4-5 दिन) पर सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। वर्षा ऋत में सिंचाई की आवश्यकता नही होती हैं किन्तु अधिक दिनों तक वर्षा न होने की दशा में सिंचाई करनी चाहिये। सिंचाई थाला विधि से करनी चाहिये जिससे खरपतवार कम होंगे।

निंदाई गुड़ाई (Weeding)

पौधों की प्रारम्भिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है क्योंकि इस अवस्था में बेले छोटी होने के कारण खरपतवारों में दब जाती हैं। इसके लिये दो बार गुड़ाई करें जिससे नींदा नियंत्रण के साथ ही जड़ो मे वायु संचार भी होगा। नींदा नियंत्रण के लिये आक्सीक्लोओरजन दवा का बुवाई पूर्व 1.2 किलोग्राम/हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जा सकता हैं।

वर्षा ऋतु में जड़ो पर मिट्टी चढ़ा देना चाहिये जिससे जड़ो को जल प्लावन से बचाया जा सकें।

हारमोन उपचार

कद्दू में 2-4 पत्ती की अवस्था पर इथ्रेल के 250 पी.पी.एम (250 मिली ग्राम प्रति लीटर) सान्द्रण वाले घोल का छिड़काव करने से मादा पुष्पों की संख्या बढ जाती हैं तथा उपज अधिक मिलती हैं।

पौध संरक्षण(Plant protection)

अ-कद्दू के कीट(Pumpkin pests)

1.कद्दू का लाल कीड़ा

वयस्क कीड़े फलों को काटकर गिरा देते हैं एवं गिडार जड़ो को नुकसान पहुँचाते हैं।

रोकथाम

इसके नियंत्रण के लिये ट्राइजोफास 40 ई.सी. या कार्बोरिल 50 प्रतिशत घुलनशील चूर्ण का 1200-1500 ग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।

२.फल मक्खी

इसकी इल्ली (मैंगट) फलों में छिद्र बनाकर खाती हैं एवं बाद में फलगिर जाते हैं।

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिये मेलाथियान 50 ई. सी. दवा 1 मि. ली./लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें। एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिये लगभग 1000 लीटर घोल की आवश्यकता होती हैं।

इसके अतिरिक्त अन्य कीट जैसे एपीलेक्ना बीटल, लीफ माइनर, थ्रिप्स आदि भी कुछ मात्रा में नुकसान पहुँचाते हैं जिन्हे ट्राइजोफास 40 ई.सी. के 0.05 प्रतिशत घोल के छिड़काव से नियंत्रित किया जा सकता हैं।

ब.कद्दू के रोग एवं उनकी रोकथाम(Pumpkin diseases)

1.चर्णिल फफूंदी/बुकनी रोग

इसमें तने पत्तों एवं फलों पर सफेद चूर्ण जम जाता है जो बाद में भूरापन ले लेता हैं। इससे फलों की वृद्धि रूक जाती हैं। एवं गुणवत्ता गिर जाती हैं

रोकथाम

इसकी रोकथाम के लिये केराथेन 0.05 प्रतिशत या कार्बे्रन्डाजिम 0.1 प्रतिशत का 2-3 बार छिड़काव 15 दिनों के अन्तर पर करें।

2.मृदुरोमिल फफूंदी

प्रभावित पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले या हल्के लाल-भूरे रंग के धब्बे बनते हैं तथा निचली  सतह पर गुलाबी पावडर/चूर्ण जम जाता हैं

3. मोजेक

यह रोग विषाणु के कारण होता हैं तथा माहू द्वारा फैलता हैं। इसके कारण पीले-हरे चकते (फफोले) से पड़ जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिये रोगी पौधों को उखाड़ दें एवं मोनोक्रोटोफास 004 प्रतिशत या आॅक्सी डेमेटान मिथाइल 0.1 प्रतिशत छिड़काव करें।

कद्दू की तुड़ाई

कद्दू एवं कुम्हड़ा के फल अपरिपक्व एवं परिपक्व दोनों अवस्थाओं में तोड़े जोते हैं। अपरिपक्व अवस्था में तोड़ने पर फलो को बाजार में तुरन्त ले जाना चाहिये परिपक्व अवस्था मे तोड़ने पर फलों का संग्रहण किया जा सकता हैं। परिपक्व अवस्था में कुम्हड़ा के फलों पर मोमी आवरण अधिक होता है तथा डंठल सूखने लगता है कद्दू के फल का परिपक्व  अवस्था में रंग परिवर्तित (सामान्यतः पीला) हो जाता है। तथा छिलका कड़ा कठोर हो जाता हैं। फलों को तेज चाकू से डंठल काटकर अलग करना चाहिये जिससे बेल को नुकसान न हो। तुड़ाई समय पर करते रहना चाहिये अन्यथा नर पुष्प् अधिक आयेंगे व उपज कम हो जायेगी।

उपज(Pumpkin yield per acre)

समुचित फल प्रबन्धन के द्वारा कुम्हड़ा की 300-400 क्विंटल/हेक्टेयर तथा काशीफल एवं विलायती कद्दू की 200-250 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है। छप्पन कद्दू की 450-550 क्विंटल/हेक्टेयर उपज प्राप्त होती हैं।

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya , Jabalpur,Madhya Pradesh.

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