0
  • No products in the cart.
Top
ईसबगोल की कृषि तकनीक - Kisan Suvidha
11194
post-template-default,single,single-post,postid-11194,single-format-standard,mkd-core-1.0,wellspring-ver-1.2.1,mkdf-smooth-scroll,mkdf-smooth-page-transitions,mkdf-ajax,mkdf-blog-installed,mkdf-header-standard,mkdf-sticky-header-on-scroll-down-up,mkdf-default-mobile-header,mkdf-sticky-up-mobile-header,mkdf-dropdown-slide-from-bottom,mkdf-search-dropdown,wpb-js-composer js-comp-ver-4.12,vc_responsive

ईसबगोल की कृषि तकनीक

ईसबगोल की कृषि तकनीक

ईसबगोल की कृषि तकनीक

हाल के वर्षों में औषधीय पादपों की मांग केवल देश के भीतर ही नहीं बढ़ी है बल्कि निर्यात के लिए भी उनकी मांग में भारी तेजी आई है । अधिकाधिक संख्या में किसान इस अति मांग वाले क्षेत्र में प्रवेश कर रहे है । राष्ट्रीय औषधीय और सगंधीय पौध अनुसंधान केन्द्र, आनंद ने ईसबगोल की खेती के लिए कृषि क्रियाओं का पैकेज तैयार किया है ।

ईसबगोल (प्लानटेगो ओवाटा) एक महत्वपूर्ण फसल है जो रबी के मौसम के दौरान मुख्यतया गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उगाई जाती है । इसके बीज के आवरण को भूसी के नाम से जाना जाता है जिसमें औषधीय गुण होते हैं, जो कब्ज, पाचनतंत्र संबंधी जलन आदि के लिए प्रयोग की जाती है । इसे खाद्य उद्योगों में भी आइसक्रीम, कैंडी, बिस्कुट आदि बनाने में प्रयोग किया जाता है । इस समय, अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में ईसबगोल की भूसी का निर्यात करने वाला भारत एकमात्र देश है ।

 

मौसम

ईसबगोल ठण्डे और सूखे मौसम की फसल है । गैर मौसमी बरसात अथवा फसल पकने के दौरान अधिक ओस गिरने के कारण बीज पूरी तरह खराब हो सकता है । इसलिए सर्दियों में बरसात वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होते ।

 

मिट्टी

प्रारम्भिक तौर पर इसकी फसल हल्की रेतीली से रेतीली दोमट मिट्टी में उगाई जाती है । तथापि, दोमट मिट्टी, मध्यम काली और भारीकाली मिट्टी में भी इसकी खेती सफलता पूर्व की जा सकती है । इसकी सफलतापूर्व खेती के लिए अच्छी जल निकासी अनिवार्य है ।

 

भूमि तैयार करना

बीजों के बेहतर अंकुरण के लिए खेत की अच्छी जुताई अनिवार्य है । मिट्टी की दशा के आधार पर भूमि की जुताई और समुचित पाटा का प्रयोग करना चाहिए । मिट्टी की किस्म और ढलान के अनुसार सारी भूमि को छोटे प्लाटों (8-12 मी. ग 3 मी.) में विभक्त किया जा सकता है ।

 

बुआई का समय

जल्दी बुआई अधिक प्ररोही वृद्धि को बढ़ाती है जबकि देरी से बुआई कुल वृद्धि समय को घटाती है और मानसून पूर्व वर्षा के कारण बीज को पकने से पहले बिखरने के जोखिम को बढ़ाती है । इसकी बुआई का सही समय नवम्बर माह का दूसरा पखवाड़ा होता है । यदि दिसम्बर के पहले पखवाड़े के बाद बुआई में देरी की जाती है तो फसल की प्रबल हानि होने की आशंका होती है ।

 

ईसबगोल की किस्में

संस्तुत किस्में और उनकी उपलब्धता के स्त्रोत इस प्रकार हैं –

किस्में उपलब्धता के स्रोत
गुजरात ईसबगोल 2 अध्यक्ष, औषधीय एवं सगंधीय पौध पर ए आई सी आर पी, गुजरात कृषि विश्वविद्यालय, आनन्द, गुजरात |
जवाहर ईसबगोल 4 (एम आई बी 4) अध्यक्ष, औषधीय एवं सगंधीय पौध पर ए आई सी आर पी, के.एन.के. कृषि महाविद्यालय, जे.एन.के.वी.वी. मंदसौर, मध्यप्रदेश |
एच आई 5 अध्यक्ष, औषधीय एवं सगंधीय पौध पर ए आई सी आर पी,   सी.सी.एस. हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा |

बीज दर

पिछले वर्ष के मोटे, रोगमुक्त बीजों को बुआई के लिए प्रयोग किया जा सकता है । अनुकूलतम बीजदर 3-4 किलोग्राम/हैक्टेयर है । उच्च बीजदर से मृदुरोपिल फफूंदी रोग बढ़ सकता है ।

 

 बुआई की विधि

छिटकवां बुआई (ब्राडकास्टिंग) के पश्चात झाडू/पेड़ की पत्तेदार टहनी से हल्की बुहार करनी चाहिए । यह बुहार एक तरफ से होनी चाहिए । समरूप अंकुरण के लिए यह ध्यान देना चाहिए कि बीजों को मिट्टी में गहरे न दबाया जाए ।

 

 सिंचाई

बुआई के तुरन्त बाद धीमे प्रवाह से एक हल्की सिंचाई की जाए । 6-7 दिनों के बाद भी कम अंकुरण की दशा में दुबारा सिंचाई की जानी चाहिए । रेतीली दोमट मिट्टी में सामान्यतः तीन सिंचाई संस्तुत की जाती है – पहली बुआई के समय तथा दूसरी बुआई के 30 दिन बाद और तीसरी बुआई के 70 दिन बाद । आखिरी सिंचाई बालियों की अधिकतम संख्या में दूध भरने की अवस्था में करनी चाहिए । हल्की मिट्टी वाले सूखे प्रदेशों में और अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है । यह पौधा कम लवणता को सह सकता है, अतः सिंचाई के लिए हल्का लवणीय जल भी (ई.सी.4 डैसी सीमन प्रति मीटर तक) प्रयोग किया जा सकता है । इस अधिक लवणता वाले पानी के उपयोग से बीज की उपज कम हो जाती है ।

 

निराई-गुड़ाई

बुआई के दो माह के भीतर सामान्यतः दो बार निराई की आवश्यकता होती है । पहली निराई बुआई के 20-25 दिन के बाद करनी चाहिए ।

 

खाद और उर्वरक

इस फसल को बहुत कम नाइट्रोजन तत्व की जरूरत होती है । इसलिए अकार्बनिक नाइट्रोजन तभी दी जानी चाहिए यदि मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन की मात्रा 120 कि.ग्रा./हैक्टेयर से कम हो । सामान्यतः 20-30 कि.ग्रा./हैक्टेयर नाइट्रोजन और 15-25 कि.ग्रा./हैक्टेयर फास्फोरस अनुकूल होता है । आधी नाइट्रोजन और फास्फोरस की पूरी मात्रा आखिरी जुताई के साथ और शेष नाइट्रोजन को बुआई के 40 दिन बाद भूमि की ऊपरी सतह पर फैलाना चाहिए ।

 

रोग और नाशीजीव प्रबंधन

मृदुरोमिल फफूंदी ईसबगोल के रोगों में मुख्य है । सिफारिश की गई मात्रा से अधिक नाइट्रोजन, बीजदर और सिंचाई से इस रोग की संभावना बढ़ जाती है । इस रोग को प्रभावशाली ढंग से रोका जा सकता है । (क) मेटलेक्सिल (5 ग्राम/किलोग्राम बीज की दर से एप्रोन एस डी) द्वारा बीज का शोधनए और (ख) रोग के सर्वप्रथम पनपने पर 0.2ः मेटलेक्सिल (रीडोमिल एम जैड) का छिड़काव । यह छिड़काव 12-14 दिनों के अन्तराल में दो बार करना चाहिए । प्रभावी बीज की पैदावार छिड़काव रहित फसल के मुकाबले 40ः से अधिक बढ़ सकती है । तथापि, उत्पादन में नाशीजीव नाशी अवशिष्ट की समस्या से बचने के लिए फसल काटने से कम से कम 45 दिन पहले फफूंदी नाशक और कीटनाशक पदार्थों का छिड़काव बन्द करना जरूरी है ।

माहू या एफिड इस फसल को नुकसान पहुंचाने वाला प्रमुख कीट है । माहू सामान्यः बुआई के 50-60 दिनों के बाद दिखाई देते हैं । 12-15 दिन के अन्तराल पर 0.025: आक्सीडिमेटन मिथाइल (मेटासिस्टोक्सि 25 ई.सी.) के दो छिड़काव नाशीजीव का प्रभावी नियन्त्रण कर सकता है । पहला छिड़काव सामान्यतः फरवरी के पहले पखवाड़े के दौरान करना चाहिए क्योंकि इससे छिड़काव रहित फसल के मुकाबले बीज की पैदावार लगभग 40: बढ़ जाती है । फसल पकने में 110-120 दिन लगते हैं । पकने पर (मार्च-अप्रैल तक) पत्तों का रंग पीला और बालियां भूरी हो जाती हैं । यदि गैर मौसमी बरसात की संभावना हो तो बीजों को बिखरने के लिए कुछ कम पकी बालियां ही काट लेनी चाहिए । तथापि ऐसी फसल की भूसी की गुणवत्ता घट जाती है ।

 

कटाई और उपज

बालियों की कटाई ओस सूखने (प्रातः 10 बजे के बाद) के बाद करें । जब मिट्टी बहुत सख्त नहीं होती है तो पौधों को बुनियादी स्तर पर काटकर या जड़ से उखाड़ लिया जाता है । कटाई करके पौधों को मड़ाई वाले प्रांगण में ढेर लगा देना चाहिए । कुछ दिनों के बाद ट्रेक्टर अथवा बैलों द्वारा इसे दाब कर बीज अलग कर लिए जाते हैं । मोटर/ट्रैक्टर द्वारा चालित गहाई मशीन प्रयोग करके भी बीजों को अलग किया जा सकता है (बाजरे को अलग करने वाले जाल का प्रयोग किया जा सकता है) । गुजरात में सामान्यतौर पर 800-1000 कि.ग्रा./हैक्टेयर बीज की पैदावार प्राप्त होती है । यद्यपि अनुकूल मौसम और बेहतर प्रबंधन द्वारा अधिक बीज पैदा किया जा सकता है । आमतौर पर बीज उत्पाद की दुगनी भूसी निकाली जाती है । भूसी को पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जा सकता है ।

 

विपणन

अभी भी इसके विपणन के लिए संगठित बाजार ज्यादा नहीं है । कई क्षेत्रों में किसान लाभकारी मूल्य प्राप्त करने हेतु सहकारिता स्तर पर पैदावार को बेंचते हैं ।

 

सावधानी:

औषधीय और सगंधीय पौधों की खेती पहले इसके बाजार सुनिश्चित करके की जाती है । हानिपूर्ण विक्रय के जोखिम को कम करने के लिए पूर्व खरीददारी का इंतजाम करना अच्छा होगा ।

 

स्रोत-

  • राष्ट्रीय औषधीय और सगंधीय पौध अनुसंधान केन्द्र बोरियावी-387 310 ,आनंद

No Comments

Sorry, the comment form is closed at this time.