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अमरूद की उन्नत खेती / Guava cultivation-मध्यप्रदेश - Kisan Suvidha
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अमरूद की उन्नत खेती / Guava cultivation-मध्यप्रदेश

अमरुद की खेती

अमरूद की उन्नत खेती / Guava cultivation-मध्यप्रदेश

परिचय

अमरूद भारत का एक लोकप्रिय फल हैं। क्षेत्रफल एवं उत्पादन की दृष्टि से देश में उगाए जाने वाले फलों में अमरूद का चैथा स्थान है। यह विटामिन ‘‘सी‘‘ का मुख्य स्त्रोत हैं। यह असिंचित एवं सिंचित क्षेत्रो में सभी प्रकार की जमीन में उगाया जा सकता हैं।

 

भूमि एवं जलवायु

अमरूद को लगभग प्रत्येक प्रकार की मृदा में उगाया जा सकता है, परंतु अच्छे उत्पादन के लिये उपजाऊ बलुई दुमट भूमि अच्छी पाई गई है। अमरूद की खेती 4.5 से 9.0 पी. एच. मान वाली मिट्टी में की जा सकती है। परंतु 7.5 पी. एच. मान से उपर वाली मृदा मे उकठा रोग के प्रकोप की संभावना अधिक होती हैं। अमरूद उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में सफलतापूर्वक पैदा किया जा सकता हैं। परंतु अधिक वर्षा वाले क्षेत्र अमरूद की खेती के लिये उपयुक्त नही होते हैं। इसके लिये 15 डिग्री से. से 30 डिग्री से. तापमान अनुकूल होता हैं। यह सूखे को भी भली-भाँति सहन कर लेता हैं।

तापमान के अधिक उतार चढाव, गर्म हवा कम वर्षा, जलक्रान्ति भूमि, जल तथा खाद की कमी का फलोत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव कम पड़ता हैं।

 

अमरुद की किस्में

यद्यपि अमरूद में थोड़ी बहुत भिन्नता लिये करीब 80-90 किस्में भारत में उगाई जा रही हैं, परंतु केवल 10-12 किस्मों को ही व्यावसायिक स्तर पर उगाया जाता है। इनमें से इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ 49, चित्तीदार, ग्वालियर – 27, बेेहत कोकोनट, एपिल ग्वावा, धारीदार एवं सहारनपुर बेदाना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त अर्का मृदुला, ष्वेता, ललित पंत प्रभात वयवसायिक उत्पादन हेतु उपयोग में लाई जा सकती हैं। कोहीर, सफेद एवं सफेद जाम नामक संकर प्रजातियाँ भी उपयोग में लाई जा सकती हैं।

१.इलाहाबाद सफेदा

इस किस्म के पेड़ सीधे बढने वाले एवं मध्यम उंचाई वाले होते हैं। इसकी शाखायें लम्बी एवं घनी होती हैं। फल का आकार मध्यम, गोलाकार एवं औसत वजन 180 ग्राम होता हैं। फल की सतह चिकनी छिल्का पीला, गूदा मुलायम, सफेद, सुविकसित और स्वाद मीठा होता हैं। बीज बड़े एवं कड़े होते हैं। इस किस्म की भण्डारण क्षमता अच्छी होती हैं।

२.लखनऊ – 49

इस किस्म के पेड़ मध्यम उंचाई के फैलने वाले तथा अधिक शाखाओं वाले होते हैं। फल मध्यम से बड़े, गोल, अंडाकार, खुरदुरी सतह वाले एवं पीले रंग के होते हैं। गूदा मुलायम, सफेद तथा स्वाद खटास लिये हुये मीठा होता हैं। इसकी भण्डारण क्षमता अन्य जातियों की तुलना में अच्छी होती है तथा इसमें उकठा रोग का प्रकोप भी अन्य किस्मों की अपेक्षा कम होती हैं।

३.चित्तीदार

यह किस्म सफेदा के समान होती है परंतु फलों की सतह पर लाल रंग के चकते/धब्बे पाये जाते हैं। इसके बीज मुलायम तथा छोटे होते हैं। फल छोटे, गोल अण्डाकार, चिकने एवं हल्के पीले रंग के होते हैं। गूदा मुलायम, सफेद, सुवास युक्त एवं मीठा होता हैं।

४.एप्पल कलर

इस किस्म के भी पौधे मध्यम उंचाई के एवं फैले हुये होते हैं। फल छोटे, गोल एवं चिकने होते हैं। छिलका गुलाबी या हरे लाल रंग का होता हैं। फलों का गूदा मुलायम, सफेद एवं सुवास युक्त होता है। बीज मध्यम आकार के होते हैं तथा फलों की भंडारण क्षमता मध्यम होती हैं। इस किस्म के पौधों की पत्तियाँ ठंड में कुछ लाल रंग की हो जाती हैं।

५.अर्का मृदुला

यह जाति इलाहाबाद सफेदा से पौधे चुनाव विधि के द्वारा विकसित की गई हैं। फल चिकने, मध्यम आकार, मुलायम बीज, गूदा सफेद एवं मीठा होता हैं। इस किस्म में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी पाया जाता हैं फलों की भण्डारण क्षमता अच्छी होती हैं।

६.ललित

यह किस्म सी.आई.एस.एच. लखनऊ द्वारा विकसित की गई है। फल मध्यम आकार एवं केशरनुमा आकर्षित पीले रंग के होते हैं। गूदा गुलाबी रंग का होता हैं। जिसके कारण यह किस्म संरक्षित पदार्थो को बनाने हेतु उपयुक्त होती हैं। यह किस्म इलाहाबाद सफेदा की अपेक्षा 24 प्रतिशत तक अधिक उत्पादन देती हैं।

 

संकर  जातियाँ

१.अर्का अमूल्या

यह जाति सीडलस एवं इलाहाबाद सफेदा के संकरण से तैयार की गई है। इसके वृक्ष मध्यम आकार के एवं अधिक उत्पादन देने वाले होते हैं। फल मध्यम आकार (180-200 ग्राम) सफेद रंग, गूदा मीठा, मुलायम एवं बीज छोटे होते हैं। फलों की भंडारण क्षमता अच्छी होती हैं।

 

प्रसारण तथा प्रवर्धन

अमरूद का प्रसार बीज तथा वानस्पतिक विधियों द्वारा किया जा सकता है लेकिन बीज द्वारा प्रसारित पौधों की गुणवत्ता अच्छी नही होती है तथा फल आने में अधिक समय लेेते हैं। अतः अमरूद का बाग लगाने के लिये वानस्पतिक विधियों द्वारा तैयार पौधों का ही उपयोग करना चाहिये। इसके व्यावसायिक प्रसार के लिये गूती, पेंच कलिकायन विधि का प्रयोग करके पौधे तैयार करें।

 

पादप रोपण

अमरूद के पौधे लगाने का मुख्य समय जुलाई से अगस्त तक है लेकिन जिन स्थानों में सिंचाई की सुविधा हो वहाँ पर पौधे फरवरी-मार्च में भी लगाये जा सकते हैं। बाग लगाने के लिये खेत को समतल करें। इसके पश्चात पौधे लगाने के लिये निष्चित दूरी पर 60 ग 60 ग 60 से.मी. आकार के गड्ढे तैयार करें। इन गड्ढों को 15-20 कि.ग्रा. अच्छी तैयार हुई गोबर खाद, 500 ग्राम सुपर फास्फेट, 250 ग्राम पोटाश तथा 100 ग्राम मिथाईल पैराथियाॅन पाउडर को अच्छी तरह से मिट्टी में मिला कर पौधे लगाने के 15-20 दिन पहले भर दें।

बाग में पौधे लगाने की दूरी मृदा की उर्वरता, किस्म विषेश एवं जलवायु पर निर्भर करती है। बीजू पौधों को कलमी पौध से ज्यादा जगह की आवश्यकता होती हैं। इस प्रकार कम उपजाउ भूमि मे 6 ग 6 मी. एवं 6.5 ग 6.5 मीटर की दूरी पर पौधे लगायें।

 

सघन बागवानी/रोपण

अमरूद की सघन बागवानी के बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त हुये हैं। सघन रोपण में प्रति हेक्टेयर 500 से 5000 पौधे रखें तथा समय – समय पर कटाई – छटाई करके एवं वृद्धि नियंत्रकों का प्रयोग करके पौधों का आकार छोटा रखें। इस तरह की बागवानी से 30 टन से 50 टन उत्पादन प्रति हेक्टेयर लिया जा सकता हैं। जबकि पारम्परिक विधि से लगाये गये बगीचों का उत्पादन 15-20 टन प्रति हेक्टेयर होता हैं।

खाद एवं उर्वरक

अमरूद की संतोशजनक वृद्धि एवं उत्पादन के लिये पर्याप्त मात्रा मे खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग आवष्यक हैं। अन्य पौधों की तरह अमरूद को भी 16 तत्वों की आवश्यकता होती है जिनमें नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश युक्त तत्वों की काफी मात्रा में आवश्यकता होती हैं। जस्ते एवं बोराॅन तत्वों की कम मात्रा में आवश्यकता पड़ती है। अमरूद के कुछ बागों/ पौधों में जस्ते की कमीं देखी गई हैं। इसकी कमी से पत्तियों का आकार छोटा हो जाता हैं। बहुत सी छोटी व नुकीली पत्तियाँ गुच्छो के रूप् में निकलती हैं।

पत्तियों के नसों का रंग हल्का पीला हो जाता हैं। बहुत अधिक कमीं होने पर पेड़ों की शाखाये उपर की तरफ से सूखना प्रारंभ कर देती हैं। पौधों में फूल कम आते हैं। एवं जो फल लगते हैं, फटकर सूख जाते हैं बोराॅन की कमी से फलों को अंदर बीजों के पास एक धब्बा बन जाता है जो गूदे की तरफ बढ कर गूदे को भूरे या काले रंग का कर देता है तथा प्रभावित भाग कड़ा हो जाता हैं। फलों का आकार छोटा हो जाता हैं। अतः पौधों की उत्तम वृद्धि एवं उत्पादन के लिये खाद एवं उर्वरकों की निम्नलिखित मात्रा का प्रयोग करें।

 

अमरूद के लिये खाद एवं उर्वरक की मात्रा

पौधों की आयु (वर्षो में)
गेबर खाद (कि.गा.)
नत्रजन (ग्राम)
स्फुर (ग्राम)
पोटाश (ग्राम)
 1  10  50 30 50
 2  20 100 60 100
 3  30 150 90 150
 4  40  200 120 200
 5 50 250 150 250
 6 वर्ष एवं उपर 60 300 180 300

 

उपरोक्त खाद एवं उर्वरकों के अतिरिक्त 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट 0.4 प्रतिशत बोरिक ऐसिड एवं 0.4 प्रतिशत काॅपर सल्फेट का छिड़काव फूल आने के पहले करने से पौधों की वृद्धि एवं उत्पादन बढाने में सफलता पाई गई हैं।

 

जैविक खाद

अमरूद में नीम की खली 6 कि.ग्रा. प्रति पौधा डालने से उत्पादन में वृद्धि के साथ – साथ उत्त्म गुण वाले फल प्राप्त किये जा सकते हैं। गोबर की खाद 40 कि.ग्रा. अथवा 4 कि.ग्रा. वर्मी कंपोस्ट के साथ 100 ग्राम जैविक खाद जैसे एजोस्पाइरिलम, व्ही. ए. एम. एवं पी.एस.एम. के प्रयोग से उत्पादन में वृद्धि एवं अच्छी गुणवत्ता वाले फल पाये गये हैं।

 

खाद देने का समय एवं विधि

अमरूद में पोषक तत्व खींचने वाली जड़े तने के आस-पास एवं 30 से.मी. की गहराई में होती है। इसलिये खाद देते समय इस बात का ध्यान रखें कि खाद, पेड़ के फैलाव में 15-20 से.मी. की गहराई में नालियाँ बनायें। गोबर की खाद, स्फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा जून-जुलाई में वर्षा होने पर तथा शेष नत्रजन की आधी मात्रा सितम्बर-अक्टूबर में वर्षा समाप्त होने से पहले दें।

 

सिंचाई

अमरूद के एक से दो वर्ष पुराने पौधों की सिंचाई, भारी भूमि में 10-15 दिन के अंतर से तथा हल्की भूमि में 5-7 दिन के अंतर से करें। गर्मियों में सिंचाई का अंतराल कम करें व सिंचाई जल्दी जल्दी करें। दो वर्ष से अधिक उम्र के पौधों को भारी भूमि में 20 दिन तथा हल्की भूमि में 10 दिन के अंतर से, थाला बनाकर पानी दें। पुराने एवं फलदार पेड़ों की सिंचाई वर्षा के बाद 20-25 दिन के अंतर से, जब तक फसल बढती है, करते रहे तथा फसल तोड़ने के बाद सिंचाई बंद कर दें।

 

माल्विंग/बिछावन

असिंचित क्षेत्रों में वर्षा के जल को अमरूद में थाले बना कर सिंचित करें तथा सितम्बर माह में घास एवं पत्तियाँ बिछा कर नमी को संरक्षित करके उत्पादन में वृद्धि को तथा उत्तम गुण वाले फल प्राप्त करें।

 

कटाई – छटाई

प्रारंभिक अवस्था में कटाई-छटाई का मुख्य कार्य पौधों को आकार दें। पौधों को साधने के लिये सबसे पहले उन्हे 60-90 से.मी. तक सीधा बढने दें। फिर इस उंचाई के बाद 15-20 से.मी. के अंतर पर 3-4 शाखाये चुन लें। इसके पश्चात मुख्य तने के शीर्ष एवं किनारे की शाखाओं की कटाई एवं छटाई कर दें जिससे पेड़ का आकार नियंत्रित रहे। बड़े पेड़ो से सूखी तथा रोगग्रस्त टहनियों को अलग करें।

तने के आस-पास तथा भूमि के पास से निकलने वाले छोटे पौधों को भी निकालते रहे नही तो मुख्य पौधों की बढवार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। पुराने पौधे जिनकी उत्पादन क्षमता घट गई हो उनकी मुख्य एवं द्वितीयक शाखाओं की कटाई करें जिससे नई शाखायें आयेंगी तथा पुराने पौधों की उत्पादन क्षमता बढेगी।

 

अन्तरवर्तीय फसलें

प्रारंभ के दो तीन वर्षो में बगीचों के रिक्त स्थानों में रबी में मटर, फे्रन्चबीन, गोभी एवं मेथी, खरीफ में लोबिया, ज्वार, उर्द, मूँग एवं सोयाबीन तथा जायद (गर्मी की फसल) में कद्दू वर्गीय सब्जियाँ उगायें। बेल वाली सब्जियाँ उगाते समय यह ध्यान रखे कि बेल, अमरूद के पौधों के उपर न चढने पायें।

 

फलन उपचार (बहार ट्रीटमैंट)

अमरूद में एक वर्ष में तीन फसले ली जा सकती हैं लेकिन आमतौर पर वर्ष में एक फसल लेने का सुझाव दिया जाता हैं। फसल तोड़ने के मौसम के अनुसार इसे तीन मौसमों, बरसात, जाड़ा एवं बसंत में विभाजित किया जा सकता हैं। स्थान एवं फसल के बाजार भाव को ध्यान में रखते हुये उपरोक्त में से कोई एक फसल लें। इस अवधि में दूसरी मौसम की फसल नही लें। मध्यप्रदेश में अमरूद फूलने के तीन मौसम हैं। बसंत ऋतु (मार्च-अप्रेल), वर्षा ऋतु (जुलाई-अगस्त) और शरद ऋतु।

वर्षा के फूलों से फल ठंड में तथा शरद ऋतु के फूलों से फल बसंत ऋतु में आते हैं।वर्षाकालीन फसल के फल जल्दी पक जाते हैं तथा उत्तम गुण वाले नही होते हैं। इस फसल में कीट एवं रोगों का प्रकोप भी अधिक होता है। जबकि जाड़े की फसल के फल उत्तम गुण वाले होते हैं। तथा फलों में विटामिन-सी की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती हैं। वर्षाकालीन फसल में विटामिन-सी की मात्रा ठंड की फसल की लगभग आधी पाई जाती है तथा वर्षाकालीन फसल को बाजार में अच्छा मूल्य नही मिल पाता हैं। अतः ठंड की फसल लेने की सिफारिश की जाती हैं। वर्षाकालीन फसल को रोकने के लिये एवं ठंड की फसल लेने के लिये निम्नलिखित उपाय करें।

1. अप्रेल से जून तक पौधों को पानी नही दें। पानी रोकने की यह क्रिया 4 वर्ष से अधिक उम्र के पौधों में ही करें जिससे बसंत ऋतु में आये फूल गिर जाते हैं तथा वर्षांत में फूल काफी संख्या में आते हैं। इस कार्य हेतु स्थानीय अनुभव अनुसार पानी रोकने की समय सीमा तय करें।

2. यूरिया का 10 प्रतिशत घोल का छिड़काव मार्च या अप्रेल माह में करने से बसंत ऋतु में आये फूल एवं पत्तियाँ झड़ जाती है तथा मृग बहार (वर्षांत के फूल) अच्छी आती हैं।

3. बसंत ऋतु के फूलों को गिराने के लिये 100-200 पी.पी.एम. नेफ्थ्लीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव फूलों को गिराने के लिये 100-200 पी.पी.एम. नेफ्थलीन ऐसेटिक एसिड के घोल का छिड़काव फूलों के उपर 20 दिन के अंतराल से दो बार करें।

 

अमरुद के रोग एवं कीट नियंत्रण

रोग

यद्यपि अमरूद में कई प्रकार की बीमारियाँ जैसे विल्ट, एन्थ्रेक्नोज, पौध अंगमारी, तना कैन्कर, फल चित्ती एवं स्कैब आदि से नुकसान होता है लेकिन सबसे अधिक नुकसान विल्ट से होता है।

उखटा

यह अमरूद का सबसे विनाशकारी रोग हैं। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम वर्षांत में दिखाई देते हैं। रोगी पेड़ों की पत्तियाँ भूरे रंग की हो जाती हैं। एवं पेड़ मुरझा जाता हैं। प्रभावित पेड़ों की डालियाँ एक-एक करके सूखने लगती हैं। यह रोग उन क्षेत्रों में अधिक तीव्र गति से फैलता है जहां की मृदा का पी. एच. मान 7.5 से अधिक होता हैं। भूमि की नमी भी रोग के फैलने में सहायक होती हैं।

मृदा आर्द्रता (60-80 प्रतिशत) पर रोग का प्रकोप बढ जाता हैं। यह रोग लाल लैटराइट एवं एल्यूवियल भूमि में तीव्रता से फैलता हैं। इस रोग के नियंत्रण के लिये रोगी पौधों को निकालकर जला दें तथा रोगी पौधों को निकालने के बाद गड्ढो की मिट्टी को एक ग्राम बेनलेट या बैविस्टीन प्रति लीटर पानी में घोल कर (20 लीटर प्रति गड्ढा) उपचारित करें।

भूमि में चूना, जिप्सम तथा कार्बनिक खाद मिलाकर रोग के प्रकोप को कम करें। अमरूद की लखनऊ 49 कस्म मे यह रोग कम लगता हैं। अतः इस जाति का प्रयोग करना चाहिये। चायनीज जाति के अमरूद इस रोग से काफी हद तक प्रतिरोधी पाये गये हैं अतः इसे मूलवृन्त के रूप में प्रयोग करें।

 

कीट

अमरूद में तना छेदक, फल की मक्खी, मिली बग, स्केल कीट आदि से नुकसान होता है। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान छाल भक्षक इल्ली के द्वारा होता है, जो कि अमरूद के अतिरिक्त आम, बेर, अनार तथा नींबू जाति के फलों पर भी आक्रमण करता हैं। इस कीट की इल्ली तने की छाल खाती है तथा तने में छेद कर देती है। छाल खाने के बाद एक प्रकार का काला अवशेष छोड़ती हैं जो कि प्रभावित हिस्सों पर चिपका रहता हैं। इसकी रोकथाम के लिये छिद्रों में मिट्टी के तेल या पेट्रोल या न्यवान से भीगी रूई छेद में डालें एवं उपर से छेद के मुंह को गीली मिट्टी से बंद कर दें।

 

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi VishwaVidyalaya

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