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अनार की खेती / Pomegranate farming / Pomegranate cultivation-Madhya Pradesh - Kisan Suvidha
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अनार की खेती / Pomegranate farming / Pomegranate cultivation-Madhya Pradesh

अनार की खेती

अनार की खेती / Pomegranate farming / Pomegranate cultivation-Madhya Pradesh

परिचय

अनार एक झाड़ीनुमा पौधा है, जिसका वानस्पतिक नाम पुनिका ग्रेनेटम तथा कुल पुनकेशी हैं। इसका फल बलास्ट है जो बेरी का एक प्रकार हैं। फल का खाया जाने वाला भाग ‘‘एरिल‘‘ (बीज चोल – यानि बीज के ऊपरी चढी परत) हैं। औषधीय गुण और पौष्टिकता के कारण यह अत्यंत महत्वपूर्ण फल है, इसलिए एक अनार सौ बीमार की कहावत प्रचलित हैं।

यह सदापर्णी झाड़ हैं परंतु जलवायु के अनुसार पर्णपाती भी होता हैं। शीत ऋतु में जब तापमान कम हो जाता हैं तो पत्तियाँ झड़ जाती है तथा पौधा सुषुप्तावस्था में आ जाता है। शीत में सामान्य ठंडक तथा गर्मी में गर्म व शुष्क वातावरण इसकी खेती के लिये उपयुक्त होता हैं। सामान्यतः 11 से 40 डिग्री सेलसियस तापमान इसके लिये उपयुक्त हैं। फल के पकने के समय बरसात या आर्द्रता अधिक होने से फलों की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।

भूमि एवं भूमि की तैयारी

अनार की खेती वैसे तो हर प्रकार की भूमि में हो सकती है किन्तु कछारी या बलुई दोमट मृदा सर्वोत्तम होती है। यह पौधा कुछ हद तक क्षारीयता भी सहन कर लेता हैं। हैदराबाद के आसपास नरम मुरम वाली हल्की मृदा में इसकी व्यावसायिक बागवानी की जाती है, जहाँ बगीचे की मृदा व्यवस्था, सिंचाई, पोषण आदि का विशेष ध्यान दिया जाता हैं। सभी प्रकार की मृदा में जल निकास अच्छा होना आवष्यक हैं। मृदा की गहराई 1.5 से 2.0 मीटर होनी चाहिये।

गर्मी के मौसम या अन्य समय में लगभग 50 ग 50 ग 50 से.मी. नाप के गड्ढे, सिफारिश की गई दूरी पर बनायें। इन गड्ढों को गर्मी में खुला छोड़ दें। अन्य मौसम में आसपास की घास एवं कचरा गड्ढे में डाल कर जला दें तथा 20-25 किलो गोबर की खाद, 1 किलो नीम/ अरण्डी/ करंज की खली, आधा किलो सिंगल सुपर फास्फेट, 250 ग्राम म्यूरेट आॅफ पोटाश तथा 50 ग्राम कार्बोरिल चूर्ण प्रति गड्ढे में डाल कर जमीन से 10-15 से.मी. उंचाई तक भरें और गड्ढा बैठ जाने पर पौधा लगायें।

अनार की किस्में एवं विवरण

अनार की कुछ अच्छी किस्में निम्नलिखित हैं –

१.मृदुला (हाईब्रिड – 63)

यह किस्म महात्मा फुले कृषि विद्यापीठ, राहुरी (महाराष्ट्र) से विकसित की गई हैं। फल मध्य से बड़े आकार के होते हैं। दाने मुलायम, गहरे लाल रंग के, मीठे, कुल घुलनशील ठोस पदार्थ 17.9 तथा अम्लीयता 0.47 प्रतिशत होती हैं।

२.गणेश

यह महाराष्ट्र की अत्यंत लोकप्रिय किस्म है। यह उद्यान अनुसंधान केन्द्र पूना से स्थानीय किस्मों के चयन से विकसित की गई हैं। इस किस्म के फल मध्यम से बड़े आकार के होते हैं। दाना मुलायम, गंलाबी रंग, रसदार तथा मीठा होता हैं।

३.घोलका

यह गुजरात की अच्छी किस्म हैं। फल बड़ा, छिल्का हरापन लिये हुये भूरे रंग का होता हैं। गूदा रसदार, मीठा, गुलाबी भूरा, बीज छोटे व खाने में मुलायम होते हैं।

कुछ अन्य किस्में

जी – 137, पी – 23, पी – 26, ज्योति, गणेश सलेक्षन, भगवा, अरक्ता, मस्कट, जालोर, सीडलेस, जोधपुर रेड एवं कंधारी।

प्रवर्धन

अनार का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक प्रसारण द्वारा किया जाता हैं। बीज द्वारा उगाये गये पौधे देर से फलन में आते हैं तथा सामान्यतः फलों की गुणवत्ता में बदलाव आ जाता है जो पसंद नही किया जाता है। इसलिये इसे वानस्पतिक विधि जैसे कटिंग व गूंटी द्वारा तैयार किया जाना चाहियें।

कटिंग (कलम) द्वारा

अच्छे मातृवृक्ष से लगभग 4-5 माह पुरानी शाखा जो 25-30 से.मी. लंबाई तथा पेंसिल की मोटाई (लगभग 1 से.मी.) हो, का चुनाव करें। अधिक पुरानी शाखा में सफलता कम मिलती हैं कलम के आधार भाग को गाँठ के ठीक नीचे से सीधा तथा उपरी भाग को तिरछा काटे।

पत्तियाँ या पतली शाखाएं निकाल दें। इस कलम को इस प्रकार गाड़े ताकि 2/3 भाग जमीन के अन्दर तथा शेष 1/3 भाग उपर रहें। कलम को जमीन में गाड़ने से पहले, जमीन में कलम से अधिक मोटी लकड़ी से छेद बना लें फिर उसमें कलम उगायें। अन्यथा कलम का छिल्का निकल सकता है, जिसमें जडे़ नही निकलेगी।

कलम लगाने के लिये उपयुक्त माध्यम जैसे काली मिट्टी बालू गोबर की खाद (1:1:1), हल्की मिट्टी, गोबर की खाद (1:1) तथा खण्डवा कृषि महाविद्यालय में हमने पाया कि मध्यम काली मृदा में बिना बालू व गोबर की खाद के भी सफलता अच्छी मिलती है। उत्तर भारत में इसके लिये उपयुक्त समय जुलाई-सितम्बर तथा जनवरी-फरवरी है। जड़े अधिक व शीघ्र आयें इसके लिये हार्मोन्स आई.बी.ए. (40 पी.पी.एम.) का उपचार करें।

गूँटी

अनार में गूँटी जुलाई-अगस्त में लगायें। मातृवृक्ष की एक मौसम पुरानी शाखा जो पेंसिल की मोटाई की हो, लगभग 25-30 से.मी. चैड़ाई की छाल निकाले और इस जगह पर पहले से तैयार एक मुट्ठी नम मिट्टी लपेटे (इसे तैयार करने के लिये छानी हुई मिट्टी में इतना पानी मिलायें ताकि इसे मुट्ठी में दबाने से लड्डू बन सके)।

मिट्टी की पर्त के उपर पाॅलीथिन शीट लपेट कर सुतली से भली भाँति दोनों छोर को बाँध दें। इसके 25-35 दिन बाद जब जड़े दिखाई देने लगे तो मातृवृक्ष से इसे काट कर अलग कर दें। अब सावधानी पूर्वक पाॅलीथिन अलग कर पौधे को पौधशाला में लगा दें तथा तुरंत हल्की सिंचाई करें। जड़े अधिक व शीघ्र लाने के लिये इसमें भी हार्मोन्स आई.बी.ए. (पी.पी.एम.) का उपचार करें।

पौधे लगाने का समय एवं दूरी

अनार के पौधे लगाने का सर्वोत्तम समय जुलाई से सितम्बर हैं। वैसे अधिक ठंड व गर्मी के माह को छोड़ कर हर माह में इसे लगा सकते हैं। सामान्यतः इसे 5 X 3 मी. एवं 5 X 5 मीटर पर लगाया जाता है किंतु सघन रोपण 5 ग 2 मीटर दूरी पर करने से 2 से 2.5 गुना अधिक उपज ली जा सकती हैं।

खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं समय

पौधे की अच्छी वृद्धि, विकास व फलन के लिये संतुलित खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करें। इनकी मात्रा मृदा की उर्वरा एवं पोषक तत्व की उपलब्धता पर निर्भर करती है। फूल आने के समय पत्त्यिों में पोषक तत्वों जैसे नत्रजन 2.5 स्फुर 0.19 और पोटाश 1.47 प्रतिशत होना उपयुक्त पाया गया हैं।

अखिल भारतीय समन्वित फल अनुसंधान परियाजना के सिफारिष के अनुसार पूर्ण विकसित पौधे के लिये 600 – 700 ग्राम नत्रजन, 200-250 ग्राम स्फुर और पोटाश तथा 30 किलोग्राम गोबर की खाद प्र्रति पौधा दें।

जिसमें 50 प्रतिशत नत्रजन को कार्बनिक खाद के रूप में तथा शेष मात्रा उर्वरकों के रूप में दें। गोबर की खाद, स्फुर और पोटाश की पूरी मात्रा और नत्रजन की आधी मात्रा पहली सिंचाई के समय तथा शेष मात्रा इसके तीन सप्ताह बाद तने से 30-50 से.मी. छोड़कर पौधे के फैलाव में देकर हल्की गुड़ाई करें। नये लगाये गये पौधों को खाद एवं उर्वरको को इस प्रकार से दें:-

वर्ष

गोबर की खाद (किलो)

नत्रजन (ग्राम)

स्फुर (ग्राम)

पोटाश (ग्राम)

प्रथम  10  100  25  25
द्वितीय  20  200  25   25
तृतीय  30  300  50   50
चतुर्थ  40   400   100  100

अंतरवर्तीय फसलें

बगीचे में पौधों के बीच खाली पड़ी जमीन का सदुपयोग अंतरवर्तीय फसलें (दलहनी फसलें व सब्जियाँ) लेकर करें। इन फसलों को 2-3 वर्षो तक ले सकते हैं। जब फलन शुरू हो जाये तो इन फसलों का लेना बन्द कर दें। अंतरवर्तीय फसलों में खाद एवं उर्वरकों, सिंचाई आदि उनके सिफारिष अनुसार अलग से दें।

सिंचाई एवं नींदा नियंत्रण

अनार का पौधा सूखा सहन करने की क्षमता रखता है, फिर भी सिंचाई से पौधे की वृद्धि, विकास व पैदावार में बढोतरी होती हैं। सिंचाई, मौसम, मृदा व पौधे की आयु पर निर्भर करती हैं। शीत ऋतु में 10 – 15 दिन के अंतर से और गर्मियों में 3-5 दिन के अंतर पर करें सिंचाई रिंग विधि से करें।

फलने वाले पौधों में फूल आने के पूर्व हल्की सिंचाई व फल लगने पर पुनः सिंचाई करें।ड्रिप सिंचाई को प्राथमिकता दे, इससे न केवल उपज में वृद्धि होगी बल्कि पानी की बचत भी होगी। भारत सरकार की एक रिपोर्ट के अनुसार हैदराबाद में सतही सिंचाई से 34 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और ड्रिप सिंचाई से 67 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हुई हैं|थाले की नियमित निंदाई करें।

नींदा नियंत्रण व दो सिंचाई के बीच का अंतराल बढाने के लिये पलवार (रद्दी कागज, भूसा, पैरा एवं सूखी पत्तियाँ आदि) थाले में लगभग 10 से.मी. मोटाई में फैला दें।इससे अन्य लाभ के अलावा मृदा का तापमान भी नियंत्रण में रहता है जिससे पौधे व फल के विकास पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। खरपतवार नियंत्रण के लिये पैराक्वाॅट 2 लीटर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें। तीन सिंचाई के बाद एक बार हल्की गुड़ाई करें।

सधाई एवं छँटाई

अनार स्वभाव से झाड़ीनुमा पौधा होता हैं। अच्छा आकार व सुडौल पौधा बनाने के लिये सघाई एवं छँटाई आवष्यक हैं। अनार में सिंघाई की दो विधियाँ अपनायी जाती है – एक तनीय व बहुतनीय। एक तनीय विधि में जमीन की सतह से 60-75 से.मी. उंचाई के पश्चात 4-5 शाखायें चारो तरफ बढने दें।

जमीन से 60-75 से.मी. उंचाई तक कोई भी शाखा न निकलने दें।बहुतनीय पद्धति में 3-5 भूस्तरीय शाखा को जमीन से ही बढने दें। इस विधि को अधिक पसंद किया जाता है क्योंकि यदि एक शाखा समाप्त हो जाती है तो भी दूसरी शाखायें उपलब्ध रहती हैं।

पौध संरक्षण

१.अनार की तितली

यह फल को नुकसान पहुँचाती हैं। इसक रोकथाम के लिये वाॅटर पेपर से फलों को लपेट दें। डेल्टामैथ्रिन (0.002 प्रतिशत) या कार्बोरिल 50 डब्लू. पी. (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव फल लगने के बाद 29 दिन के अंतर से करें।

२.छिल्का खाने वाली इल्ली

यह इल्ली मुख्य तने एवं शाखाओं की छाल खाती है और तने के अंदर घुस जाती है जिससे पौधे सूख जाते हैं।

रोकथाम

मिट्टी के तेल या न्यवाॅन में रूई को भिगो कर तार द्वार छेद में भरे और तुरंत गीली मिट्टी से बंद कर दें।

३.पत्ती एवं फल धब्बा रोग

यह फफूंद जनित रोग हैं। पत्तियाँ एवं फलों में भूरे धब्बे बन जाते हैं।

रोकथाम

डायथेत जैड -75 को 0.25 प्रतिशत या बोर्डो मिश्रण (1 प्रतिशत) के चार छिड़काव 15 दिन के अंतर से करे या कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत या डायथेन एम – 45 का 0.25 प्रतिशत दवाई का छिड़काव करें।

४.जीवाणु पर्ण चित्ती रोग

यह रोग जेन्थोमोनास प्युनिकी नामक जीवाणु से फैलता हैं।

रोकथाम

ताम्रयुक्त फफूंदी नाशक का 0.3 प्रतिशत या बोर्डो मिश्रण (1 प्रतिशत) का छिड़काव करें।

५.फल सड़न रोग

यह रोग क्लेडोस्पोरियम कवक के कारण होता हैं। यह रोग फल तोड़ने के बाद लगता हैं। फल पर लाल या हल्के भूरे रंग के धब्बे आते है और बाद में पूरा फल सड़ जाता है।

रोकथाम

डायथेन एम – 45 दवाई का 0.25 प्रतिशत छिड़काव करें तथा फलों को अलग-अलग कागज में लपेट कर पैक करें।

फूलना एवं फलना

अनार में फल की तुड़ाई तीसरे वर्ष में प्रारंभ करें। इसमें तीन बहारे आती हैं। यह हैं – अमिया बहार (फूल – मार्च – अपे्रल और फल जुलाई-अगस्त में) और मृग बहार (फूल जुलाई-अगस्त और फल नवम्ब – दिसम्बर) एवं हस्त बहार (फूल अक्टूबर-नवम्ब व फल फरवरी-मार्च)। बहार का चुनाव मौसम, सिंचाई व बाजार की उपलब्धता के अनुसार करें।

बहार नियंत्रण के लिये जिस बहार में फल की तुड़ाई करनी है उसके फूल आने के लगभग दो माह पूर्व सिंचाई बंद कर दें या जड़े खोल दें और जैसे ही पत्तियाँ पीली पड़ने लगे तो उसमें खाद एवं उर्वरक देकर हल्की सिंचाई करें। इससे नई वृद्धि के साथ फूल आते हैं।

फल फटने की समस्या

यह एक प्रमुख समस्या हैं। कभी-कभी 40 से 50 प्रतिशत तक फल फट जाते हैं। फलों का फटना मिट्टी में नमी में अचानक आये परिवर्तन के कारण होता हैं। मिट्टी में नमी की कमी से फल का छिल्का कड़ा पड़ जाता हैं जिसके उपरांत पर्याप्त पानी मिलने से फल के अंदर का हिस्सा फैलने लगता है। इस कारण से फल फट जाता हैं।

नियंत्रण

भूमि में नमी की कमी नही होने दें। बोरैक्स 0.6 प्रतिशत का छिड़काव फलों के पकने से पहले करें। इससे फल फटने से बच जायेंगे।

फल तुड़ाई, भंडारण एवं उपज

अनार में फूल से फल तैयार होने या पकने में 4 से 5 माह लगते हैं। फल पकने पर छिल्के का रंग बदलने लगता है (भूरा पीलापन लिये हुये होता है)। फलों को सिकेटियर (बागवानी हेतु बड़ी कैंची) से काट कर तोड़े। शीत भंडारण (4-5 डिग्री से.ग्र. और 90-95 प्रतिशत आर्द्रता) में 7-12 सप्ताह तक रखें। इसकी पैकिंग हेतु समान्यतः बाँस की टोकनियों में पुआल या कागज की कतरनें भरें।

फलो को कागज में लपेट कर रखें। इसकी पैकिंग के लिये सी.एफ.बी बाॅक्स का उपयोग करें। एक पूर्ण विकसित पेड़ से 200-250 फल प्राप्त होते हैं। इसकी पैकिंग के लिये सी.एफ.बी. बाॅक्स का उपयोग करें।

 

स्रोत-

  • जवाहरलाल नेहरु कृषि विश्वविद्यालय,मध्यप्रदेश

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