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अनन्नास की खेती / Pineapple farming techniques-मध्यप्रदेश - Kisan Suvidha
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अनन्नास की खेती / Pineapple farming techniques-मध्यप्रदेश

अनन्नास की खेती

अनन्नास की खेती / Pineapple farming techniques-मध्यप्रदेश

परिचय

अनन्नास ब्राजील मूल का पौधा है, यह बहुवर्षीय एक बीजपत्री पौधा है। इसका तना छोटा होता है और तने की गाँठे पास-पास होती हैं। तना, पत्तियों के गुच्छे से ढका होता है और तना पुष्प् वृंत पर जाकर समाप्त होता हैं। इस पर गाँठे पाई जाती हैं।

 

भूमि

अनन्नास की खेती अनेक प्रकार की जलवायु और भूमि में की जा सकती है, फिर भी इसके लिये रेतीली दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है। अच्छे जल निकास की 5-6 पी.एच वाली एवं जैवांश बाहुल्य मृदा को अनन्नास के लिये उपयुक्त माना गया है। अनन्नास उष्ण कटिबंधीय पौधा है इसके लिये तापमान 15 से 32 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त पाया गया है।

भारत में अनन्नास को पश्चिमी समुद्र तटीय क्षेत्र तथा उत्तरी पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों एवं समुद्र तट से 1000 से 1200 मीटर उंचाई वाले स्थानों पर उगाया जा सकता हैं। पाले वाले क्षेत्रों में इस फसल को नही लगायें। मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में इसका उत्पादन अत्यंत ही कम है। मध्यप्रदेश के जबलपुर संभाग तथा छत्तीसगढ के बिलासपुर, बस्तर, सरगुजा एवं रायपुर संभाग में आसानी से उगाया जा सकता हैं। इसे अर्द्धछाया वाले स्थानों एवं सूक्ष्म वातावरण निर्मित करके भी उगाया जा सकता हैं।

 

बोनी का समय/तरीका

अनन्नास हमारे देश में बरसात के मौसम में लगाया जाता हैं, उत्तरी पूर्वी पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ वर्ष भर मृदा में पर्याप्त नमी रहती है तथा सिंचाई सुविधा उपलब्ध हो वहाँ वर्ष में किसी भी समय लगाया जा सकता हैं।
मैदानी भागों में पौधों को रोपने के पूर्व खेत की भूमि को जोत लें। पहाड़ी क्षेत्रों में सीढीदार खेत बना कर लगायें। अनन्नास को एक कतार या दोहरी कतारों में लगाये। अन्तः भूस्तरीय या स्लिप, 10 से.मी. गहरे छोटे- छेदों में रोपें। अन्तः भूस्तरीय को भूमि में सीधा लगायें और यह ध्यान रखें कि उसके कलिका वाले भाग में या केन्द्रीय भाग में मिट्टी न भरें।

भारत में अधिक दूरी पर 15 से 20 हजार पौधे प्रति हेक्टेयर लगाकर लगभग 10 से 15 टन उपज प्राप्त होती हैं। पौधे से पौधे की दूरी 25 से.मी. एवं कतार से कतार की दूरी 60 से.मी. रखें। उच्च सधन विधि के द्वारा खेत में अनन्नास के पौधों को 22.5 से.मी. ग 60 ग 75 से.मी. पर लगायें । इस विधि के द्वारा पौधे लगाने पर एक हेक्टेयर में 63700 पौधे लगाये जा सकते हैं। पौधों को 10 से.मी. गहराई पर लगायें। पौधों को एक सप्ताह छाया में सुखायें एवं सूखी हुई पत्तियाँ अलग कर दें। इसके बाद बोर्डो मिश्रण (1:1:1) के घोल में निचला भाग डुबा कर खेत में लगायें। दूरी, भूमि एवं जलवायु के अनुसार रखें।

 

अनन्नास की किस्में

बागवानी की दृष्टि से एवं व्यापारिक महत्व को देखते हुये अनन्नास की किस्मों को तीन समहू में बाँटा गया हैं।
1. कैमेन समूह: इसके अंतर्गत कैमेन/जायन्ट क्यू और क्यू किस्में शामिल हैं।
2. क्वीन समूह: इसमें क्वीन एवं रिप्लेक्वीन शामिल हैं।
3. स्पैनिश समूह: इसमें सिंगापुर, स्पैतिश, माॅरिशस की चारलोटे किस्में आती हैं।
भारत में जायन्ट क्यू, क्वीन एवं माॅरिशस को व्यावसायिक दृष्टि से बहु महत्वपूर्ण माना गया हैं।

1.जायन्ट क्यू

इसकी पत्तियाँ लम्बी, सिरे सीधे, चिकने और गौर दांतेदार होते हैं। फल बड़े एवं बेलनाकार होते हैं। इसका भार 2 से 3 किलो तक होता है। यह पछेती किस्म है। यह डिब्बा बंदी के लिये सर्वोत्तम किस्म हैं। इसके 80-85 प्रतिशत फल जुलाई से सितम्बर तक तोड़ने लायक हो जाते हैं।

2.क्वीन

पौधे छोटे होते हैं, इसकी पत्तियाँ छोटी, सिरे तीखे दांतेदार होते हैं। इसके फल छोटे 1 से 2 किलो भार तक के होते हैं। फल पकने पर पीले या सुनहरे पीले रंग के हो जाते हैं। गूदा रसदार मीठा सुनहरा पीला, अच्छे स्वाद व सुवास वाला होता हैं। यह शीघ्र पकने वाली किस्म हैं।

3.माॅरिशस

इसकी पत्तियाँ दाँतेदार होती है, फल मध्यम आकार के औसतन 1.5 से 2.5 किलो तक के होते हैं। यह मध्यम समय में पकती हैं।

4.रैड स्पैनिश

पौधे तथा फल का आकार जायन्ट क्यू एवं क्वीन के मध्य होता है। छिलका कठोर, खुरदरा तथा नारंगी-लाल रंग का होता है। गूदा हलका पीला, रेशेदार किन्तु महमोहक मसालेदार अम्ल की सुगंध लिये होता हैं। यह किस्म रोग एवं कीड़ों के प्रति सहिष्णु होती है। ताजे खाये जाने के लिये इस किस्म के फल पसंद किये जाते हैं।

 

पौध प्रवर्धन/प्रसारण

सामान्यतः अनन्नास का प्रवर्धन कार्यिक विधि से किया जाता हैं। इसके लिये पौधे के अंत भूस्तरीय सकर, स्लिप्स एवं मुकुट (क्राउन) अंगो का प्रयोग किया जाता हैं।

1.सकर

पौधे के मूल तंत्र से निकली हुई पत्त्यिों वाली शाखाओं को, जो भूमि से निकलती है उन्हे सकर कहते हैं। अनन्नास का प्रवर्धन प्रायः सकर द्वारा ही किया जाता हैं। इससे फल पैदा करने में 15-18 माह का समय लगता हैं। 500-700 ग्राम के सकर लगाने के लिये कलम लगाते हैं।

2.क्राउन (मुकुट)

फल के उपर लगी हुई पत्तियों के झुण्ड को मुकुट कहा जाता हैं। इससे फल पैदा करने में 24 माह का समय लगता हैं।

3.स्लिप

तने एवं फल के निचले भाग से और भूमि से निकली हुई पत्तीदार शाखाओं को स्लिप कहते हैं। इससे 20-22 माह तक में फल प्राप्त होते हैं। 300-400 ग्राम के स्लिप लगाने से अच्छी पैदावार होती हैं।

 

सिंचाई

अनन्नास की जड़े उथली होती हैं, अतः इसको विशेष रूप् से सूखे मौसम में हल्की सिंचाई की आवश्यकता  होती हैं। महीने में कम से कम 3 बार सिंचाई करना फसल के लिये लाभदायक रहता हैं। सिंचाई की आवश्यकता भूमि की किस्म पर आधारित होती हैं।

 

खाद

अनन्नास को पर्याप्त मात्रा में खाद की आवश्यकता पड़ती हैं तथा इसकी उत्पादन क्षमता पर नाइट्रोजन एवं पोटेषियम का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता हैं।
अनन्नास के बागों में लगभग 6 टन कम्पोस्ट खाद 500 किलो अमोनियम सल्फेट 400 से 450 किलो सिंगल सुपर फास्फेट, 160-250 किलो म्यूरेट आॅफ पोटाश प्रति हेक्टेयर दें।
उर्वरकों को कई बार में देना लाभकर होता हैं। पहली आधी मात्रा रोपाई के समय एवं दूसरी आधी मात्रा तीन महीने बाद जब पेड़ो की जड़ तत्वों को ग्रहण करने लायक विकसित हो जाये तब दें। उर्वरकों को हमेशा पौधे के आधार के पास दें।

 

कांट छाट

अनन्नास में अंतः भूस्तरीय और स्लिप्स को समय -समय पर काटते रहें क्योंकि इनकी वृद्धि से पौधे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं। अंतः भूस्तरीय में जड़ो के अच्छे विकास के लिये पहली फसल लेने के बाद पौधों पर मिट्टी चढायें।

 

अनन्नास में खरपतवार नियंत्रण एवं मिट्टी चढाना

इसके बाग में खरपतवार नियंत्रण, हाथ से निंदाई, गुड़ाई द्वारा करें, अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में जिनमे हरियाली एवं घास बहुत अधिक होती है, अन क्षेत्रों में प्रोमोसिका तथा डाईयूराॅन की दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा उपयोग करें। रसायन का प्रयोग करते समय भूमि में पर्याप्त मात्रा में नमी होनी चाहिये। निंदाई के साथ पौधों में मिट्टी चढायें जिससे कि पौधे फल-भार ग्रहण कर सकें। वर्ष में दो से तीन बार मिट्टी चढाना आवश्यक हैं। मिट्टी चढाते समय यह ध्यान रखें कि मिट्टी में हृदय का भाग न दबने पाए। प्रत्येक सिंचाई के पश्चात हल्की गुड़ाई अवश्य करें।

 

हार्मोन का प्रयोग

अनन्नास के स्लिप तथा क्राउन में जड़े लाने के लिये उन्हे आई.बी.एम. के 50 से 100 पी.पी.एम. घोल से उपचारित करें जिससे जड़े शीघ्र व अधिक निकलती हैं। 10 पी.पी.एम. प्लोट्रोफक्स को 2 प्र्रतिशत यूरिया के साथ तब तक छिड़काव करें जब तक पौधे में 30 से 40 पत्तियाँ न हो जाये। छिड़काव करने पर पौधों में एक साथ फल आयेंगे तथा हृदय सड़न की समस्या दूर हो जायेगी।

 

पौध संरक्षण

अनन्नास में शीर्ष विगलन, तथा विगलन, काला धब्बा आदि रोग देखने को मिलते हैं। अनन्नास में लगने वाले हानिकारक कीटों में मिली बग और एक प्रकार की चींटी, फल और तना भेदक आदि प्रमुख हैं।

 

अंतराशस्य

अनन्नास की खेती आम, अमरूद, आँवला, कटहल, नींबू, अनार, संतरा, मौसम्बी आदि के बागो में बीच कतारों में की जा सकती है। इन बागों में प्रथम वर्ष से 6 से 7 वर्ष तक खेती की जा सकती हैं, जिससे प्रति इकाई क्षेत्र, आय में वृद्धि की जा सकती हैं।

 

कटाई/फल तुड़ाई

सामान्य रूप से पौधों को रोपने में लगभग 15 से 18 महीने बाद पुष्प आते हैं और पुष्पन के लगभग 4-5 माह बाद फल पकने लगते हैं। अनन्नास का फल शर्करा बाहुल्य होता है और विटामिन ए.बी. एवं सी. का सर्वोत्तम स्त्रोत माना जाता हैं।फल की गुणवत्ता शर्करा की मात्रा (8-16 प्रतिशत) तथा फल के रस में प्राप्त होने वाले अम्लों (0.3 – 0.8 प्रतिशत) पर निर्भर होती हैं।

सामान्यतः जब फलों की परिपक्वता लगभग 80 प्रतिशत हो तब उन्हें तोड़ लेना चाहिये, लेकिन खाने के लिये पूर्ण परिपक्वता के बाद ही तोड़ना चाहिये। पूर्ण परिपक्वता की पहचान रंग परिवर्तन से होती है, जो गहरे से पीले या नारंगी हो जाते हैं।

 

भंडारण

पके अनन्नास के फलों को अधिक समय तक भंडारित नही किया जा सकता है, इसलिये तोड़ने के 4 से 5 दिन के भीतर ही उनका उपयोग कर लें फलों को तोड़ने के बाद उनकी छटाई कर बाँस या काष्ठ की टोकरियों में रख कर विक्रय हेतु बाजार अथवा प्रसंस्करण हेतु भेज दें।

 

उपयोग

अनन्नास के परिरक्षित पदार्थो की बाजार में बड़ी माँग हैं। अनन्नास का जूस, जैम स्कवैश और इनकी स्लाईस आदि बनाकर बेच सकते हैं। भारत में फलों का 10 प्रतिशत भाग ही परिरक्षण आदि क लिये प्रयोग किया जाता हैं। अनन्नास का मूल्य संवर्धन कर विक्रय करने से अधिक धन कमाया जा सकता है। फलों के अवशेष जैसे भूसी और अनन्नास के पौधों को पशु आहार के रूप में प्रयोग में लाया जा सकता हैं। अनन्नास की पत्तियों में से बहुत बारीक रेशे निकाले जा सकते हैं इन रेशों से कई प्रकार के वस्त्र बनाये जा सकते हैं।

 

Source-

  • Jawaharlal Nehru Krishi Vishwavidyalaya,Madhya Pradesh

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